ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr), जिसे फितरा भी कहा जाता है, हर उस मुसलमान पर फर्ज़ (Obligatory) है जिसके पास अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा माल है। इसका मुख्य उद्देश्य रोज़े के दौरान हुई गलतियों और कमियों का कफ़ारा (Expiation) देना है ताकि रोज़ा पूरी तरह पाक (Pure) हो जाए। यह अल्लाह की एक विशेष व्यवस्था है जिससे गरीबों की मदद (Helping the Poor) हो सके। ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr) केवल अमीरों के लिए नहीं, बल्कि हर उस शख्स के लिए है जो इसकी सामर्थ्य रखता है।
फितरा (Fitra) देने का सबसे उत्तम समय ईद की नमाज़ (Eid Namaz) से पहले का है, ताकि ज़रूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों (Joys of Eid) में शामिल हो सकें। अगर इसे ईद की नमाज़ के बाद दिया जाए, तो यह केवल साधारण सदका (Common Charity) बनकर रह जाएगा, फितरा नहीं कहलाएगा। इसलिए, कोशिश करनी चाहिए कि रमज़ान (Ramzan) के आखिरी दिनों में ही इसकी अदायगी कर दी जाए। ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr) समाज में आर्थिक संतुलन (Economic Balance) बनाए रखने का एक रूहानी तरीका है।
इसकी अदायगी का तरीका (Method of Payment) अनाज जैसे गेहूँ, जौ, खजूर या किशमिश (Wheat, Barley, Dates or Raisins) के रूप में या उनकी कीमत के बराबर नकदी (Cash) में हो सकता है। विद्वानों के अनुसार, स्थानीय बाज़ार की कीमतों (Market Rates) के आधार पर इसकी गणना (Calculation) करनी चाहिए। ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr) देते समय हमारी नीयत (Intention) केवल खुदा की प्रसन्नता होनी चाहिए, न कि एहसान जताना। यह हमारे माल की पाकीज़गी (Purification of Wealth) का ज़रिया है।
फितरा (Fitra) सबसे पहले अपने करीबी रिश्तेदारों (Close Relatives) को देना चाहिए जो आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं, बशर्ते वे आपके आश्रित न हों। इसके बाद पड़ोसियों और फिर आम गरीबों (General Poor) का हक आता है। ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr) पहुँचाने का अर्थ है कि हम किसी की गरिमा (Dignity) का ख्याल रखें और गुप्त रूप से मदद करें। यह रवायत (Tradition) कलीसियाई एकता और सामाजिक सुरक्षा (Social Security) का बेहतरीन उदाहरण है।
अंत में, ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr) हमें सिखाता है कि हमारी खुशियाँ तब तक अधूरी हैं जब तक हमारे समाज का कमज़ोर तबका (Weak Section of Society) हमारे साथ खुश न हो। यह एक मोमिन के दिल को उदार (Generous) बनाता है और लालच को खत्म करता है। रमज़ान का महीना (Ramzan Month) हमें देने का जज़्बा सिखाता है और फितरा (Fitra) उस जज़्बे की अमली शक्ल है। ज़कात-उल-फितर (Zakat ul Fitr) की अदायगी हमारे रोज़ों को मुकम्मल और मकबूल (Complete and Accepted) बनाती है।