ईस्टर एक 'चलने वाला पर्व' (Movable Feast) है, जिसका अर्थ है कि इसकी तारीख हर साल ईसाई कैलेंडर में बदलती रहती है। यह गणना चंद्रमा की स्थिति (Position of the Moon) पर आधारित होती है। प्राचीन चर्च के नियमों के अनुसार, ईस्टर हमेशा वसंत विषुव (Vernal Equinox) के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा (Full Moon) के बाद के रविवार को मनाया जाता है। यही कारण है कि यह कभी मार्च के अंत में तो कभी अप्रैल के मध्य में आता है।
यह खगोलीय संबंध (Astronomical Connection) प्रकृति और आध्यात्मिकता के मेल को दर्शाता है। वसंत ऋतु (Spring Season) का समय नए जीवन के फूटने का होता है, जो यीशु के पुनरुत्थान के संदेश के साथ पूरी तरह मेल खाता है। चर्च के इतिहास (Church History) में इस तारीख को लेकर काफी चर्चाएं हुई थीं, लेकिन अंततः निकिया की परिषद (Council of Nicaea) में इसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। यह कैलेंडर की व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि ईस्टर हमेशा रविवार के दिन ही पड़े।
इस तिथि के निर्धारण के साथ ही अन्य महत्वपूर्ण दिन जैसे ऐश वेडनसडे (Ash Wednesday) और पाम संडे (Palm Sunday) की तारीखें भी तय होती हैं। यह पूरा चक्र ईसाई धर्म के विश्वासियों के लिए आत्म-चिंतन (Self-reflection) और तैयारी का समय होता है। कैलेंडर की यह पद्धति सौर (Solar) और चंद्र (Lunar) दोनों गणनाओं का उपयोग करती है। यह हमें याद दिलाता है कि ईश्वर का समय मानव निर्मित कैलेंडरों से अधिक व्यापक और रहस्यमयी है।
विभिन्न ईसाई संप्रदायों (Denominations) में, जैसे कि रूढ़िवादी (Orthodox) और पश्चिमी चर्च, कैलेंडर के अंतर के कारण ईस्टर की तारीखों में कभी-कभी बदलाव देखा जाता है। हालांकि, संदेश और भावना हमेशा एक ही रहती है। तारीख चाहे जो भी हो, रविवार का दिन सूर्योदय (Sunrise) और नई रोशनी का प्रतीक बना रहता है। यह दुनिया भर के ईसाइयों को एक ही समय चक्र (Time Cycle) में बांधने का काम करता है।
कैलेंडर की इस अनूठी व्यवस्था के कारण ईस्टर का पर्व हमेशा एक नए रोमांच और प्रतीक्षा (Anticipation) के साथ आता है। लोग खगोलीय घटनाओं (Celestial Events) को देखते हुए इस पवित्र दिन का इंतजार करते हैं। यह गणना हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देती है। अंततः, यह बदलाव हमें सिखाता है कि समय निरंतर प्रवाह में है और हर साल ईस्टर हमें आध्यात्मिक रूप से जागृत होने का एक नया अवसर प्रदान करता है।