बैसाखी के अवसर पर पंजाब के हर कोने में रंगीन मेलों (Colorful Fairs) का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में ग्रामीण संस्कृति (Rural Culture) की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ऊंचे-ऊंचे झूले, सर्कस और जादू के खेल बच्चों के आकर्षण का केंद्र होते हैं। हस्तशिल्प (Handicraft) और पारंपरिक आभूषणों की दुकानें सजी होती हैं जहाँ से लोग अपनी पसंद की वस्तुएं खरीदते हैं। यह उत्सव (Celebration) मेलजोल और मनोरंजन का एक बेहतरीन संगम होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों (Cultural Programs) में लोक संगीत का जादू हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है। ढोल की आवाज पर जब गबरू जवान भांगड़ा (Bhangra) करते हैं, तो पूरा वातावरण जोश से भर जाता है। महिलाएं रंगीन फुलकारी (Phulkari) ओढ़कर गिद्धा (Giddha) और बोलियाँ डालती हैं, जो पंजाब की विरासत (Heritage) को प्रदर्शित करती हैं। इन नृत्यों के माध्यम से फसल की कटाई और जीवन के उल्लास को व्यक्त किया जाता है।
मेलों में कुश्ती और कबड्डी (Wrestling and Kabaddi) जैसी खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। स्थानीय पहलवान अपनी ताकत और दांव-पेंच (Techniques) का प्रदर्शन करते हैं, जिन्हें देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है। ये खेल ग्रामीण क्षेत्रों में शारीरिक फिटनेस (Physical Fitness) और खेल भावना को बढ़ावा देते हैं। विजेताओं को ईनाम देकर सम्मानित किया जाता है, जिससे युवाओं में उत्साह बना रहता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही लोकप्रिय (Popular) है।
खाने-पीने के स्टालों पर पारंपरिक पंजाबी पकवान (Punjabi Cuisine) जैसे जलेबी, पकौड़े और कुल्फी की महक हर किसी को लुभाती है। लोग गन्ने का रस और लस्सी का आनंद लेते हैं जो गर्मी के मौसम में राहत प्रदान करते हैं। यह समय केवल खाने का ही नहीं बल्कि एक साथ बैठकर पुरानी यादें ताज़ा करने का भी होता है। मेलों की यह रौनक सामाजिक समरसता (Social Harmony) का प्रतीक है जहाँ हर वर्ग के लोग एक साथ मिलकर जश्न मनाते हैं।
आधुनिक समय में इन मेलों में नई तकनीक (New Technology) और उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। किसान खेती के नए औजारों (Agricultural Tools) और बीजों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। पशु मेलों (Cattle Fairs) में बेहतरीन नस्ल के गाय, भैंस और घोड़ों की खरीद-बिक्री होती है। इस प्रकार बैसाखी का मेला मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान और व्यापार (Trade) का भी एक बड़ा मंच बन जाता है। यह हमारी जीवंत संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है।