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बोहाग बिहू का पहला दिन पूरी तरह से पशुधन को समर्पित होता है, जिसे मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) या 'गुरू बिहू' कहा जाता है। कृषि प्रधान राज्य होने के नाते, असम में गायों और बैलों को परिवार के सदस्य की तरह माना जाता है। इस दिन सुबह-सुबह मवेशियों को नदी या तालाब में ले जाकर नहलाया जाता है। उन्हें हल्दी और काली दाल का लेप (Paste) लगाया जाता है ताकि उनके शरीर से कीटाणु दूर रहें और वे स्वस्थ रहें।

पूजा के दौरान मवेशियों को लौकी, बैंगन और अन्य सब्जियाँ खिलाई जाती हैं। लोग 'लाओ खा, बेन्गेना खा' (Lao Kha, Bengena Kha) जैसे गीत गाते हैं, जिसका अर्थ है कि सब्जियाँ खाओ और बड़े होकर समाज की सेवा करो। मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) के माध्यम से किसान प्रकृति और अपने सहायक पशुओं के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) व्यक्त करते हैं। शाम को मवेशियों के पैरों के पास औषधीय पौधों का धुआं किया जाता है ताकि मच्छर और बीमारियाँ उनसे दूर रहें।

धार्मिक रूप से यह माना जाता है कि गौ सेवा (Service to Cows) करने से घर में सुख-समृद्धि और धन का आगमन होता है। मवेशियों को नई रस्सी (New Rope) बांधी जाती है, जो उनके साथ नए साल के नए रिश्ते की शुरुआत का प्रतीक है। मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) का यह दृश्य बहुत ही भावनात्मक और शांतिपूर्ण होता है। यह परंपरा मनुष्य और पशु के बीच के अटूट बंधन (Unbreakable Bond) को और भी मजबूत बनाती है।

गाँव के बच्चे इस उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और पशुओं को सजाने का काम करते हैं। इस दिन गायों को काम से आराम दिया जाता है और उन्हें खुला छोड़ दिया जाता है। यह दिन सिखाता है कि विकास की दौड़ में हमें उन मूक प्राणियों को नहीं भूलना चाहिए जिनकी वजह से हमारे खेतों में हरियाली है। मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) असमिया संस्कृति की संवेदनशीलता और उनके प्रकृति प्रेम का एक महान उदाहरण है।

यह अनुष्ठान (Ritual) सदियों से बिना किसी बदलाव के चला आ रहा है। यह आधुनिक पीढ़ी को अपनी जड़ों और कृषि के महत्व से जोड़ने का एक बेहतरीन तरीका है। बिहू का यह पहला चरण हमें नैतिकता और सेवा (Service) का पाठ पढ़ाता है। जब पशु प्रसन्न होते हैं, तभी किसान का मन भी खुश होता है और वह नए साल की शुरुआत एक सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) के साथ करता है।

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बोहाग बिहू का पहला दिन पूरी तरह से पशुधन को समर्पित होता है, जिसे मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) या 'गुरू बिहू' कहा जाता है। कृषि प्रधान राज्य होने के नाते, असम में गायों और बैलों को परिवार के सदस्य की तरह माना जाता है। इस दिन सुबह-सुबह मवेशियों को नदी या तालाब में ले जाकर नहलाया जाता है। उन्हें हल्दी और काली दाल का लेप (Paste) लगाया जाता है ताकि उनके शरीर से कीटाणु दूर रहें और वे स्वस्थ रहें।

पूजा के दौरान मवेशियों को लौकी, बैंगन और अन्य सब्जियाँ खिलाई जाती हैं। लोग 'लाओ खा, बेन्गेना खा' (Lao Kha, Bengena Kha) जैसे गीत गाते हैं, जिसका अर्थ है कि सब्जियाँ खाओ और बड़े होकर समाज की सेवा करो। मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) के माध्यम से किसान प्रकृति और अपने सहायक पशुओं के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) व्यक्त करते हैं। शाम को मवेशियों के पैरों के पास औषधीय पौधों का धुआं किया जाता है ताकि मच्छर और बीमारियाँ उनसे दूर रहें।

धार्मिक रूप से यह माना जाता है कि गौ सेवा (Service to Cows) करने से घर में सुख-समृद्धि और धन का आगमन होता है। मवेशियों को नई रस्सी (New Rope) बांधी जाती है, जो उनके साथ नए साल के नए रिश्ते की शुरुआत का प्रतीक है। मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) का यह दृश्य बहुत ही भावनात्मक और शांतिपूर्ण होता है। यह परंपरा मनुष्य और पशु के बीच के अटूट बंधन (Unbreakable Bond) को और भी मजबूत बनाती है।

गाँव के बच्चे इस उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और पशुओं को सजाने का काम करते हैं। इस दिन गायों को काम से आराम दिया जाता है और उन्हें खुला छोड़ दिया जाता है। यह दिन सिखाता है कि विकास की दौड़ में हमें उन मूक प्राणियों को नहीं भूलना चाहिए जिनकी वजह से हमारे खेतों में हरियाली है। मवेशी पूजा (Cattle Worship Bihu) असमिया संस्कृति की संवेदनशीलता और उनके प्रकृति प्रेम का एक महान उदाहरण है।

यह अनुष्ठान (Ritual) सदियों से बिना किसी बदलाव के चला आ रहा है। यह आधुनिक पीढ़ी को अपनी जड़ों और कृषि के महत्व से जोड़ने का एक बेहतरीन तरीका है। बिहू का यह पहला चरण हमें नैतिकता और सेवा (Service) का पाठ पढ़ाता है। जब पशु प्रसन्न होते हैं, तभी किसान का मन भी खुश होता है और वह नए साल की शुरुआत एक सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) के साथ करता है।
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