श्रमिक दिवस (Shramik Diwas) के उपलक्ष्य में महिला कार्यबल (Women Workforce) की भूमिका और उनके विशिष्ट अधिकारों पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय श्रम कानूनों में महिलाओं को विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है ताकि वे बिना किसी भेदभाव के कार्य कर सकें। प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम (Maternity Benefit Act) के तहत महिला कर्मचारियों को 26 सप्ताह का सवेतन अवकाश (Paid Leave) प्राप्त करने का अधिकार है। यह कानून न केवल उनकी नौकरी सुरक्षित रखता है बल्कि शिशु की देखभाल के लिए भी समय देता है।
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment at Workplace) को रोकने के लिए 'पोश' (POSH Act) कानून कड़े दिशा-निर्देश प्रदान करता है। प्रत्येक संस्थान में एक आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) का होना अनिवार्य है जो महिलाओं की शिकायतों का त्वरित निवारण कर सके। यह कानून एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण (Dignified Work Environment) सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। महिलाएं अपनी समस्याओं को बिना किसी डर के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष रख सकती हैं।
समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act) यह स्पष्ट करता है कि लिंग के आधार पर वेतन (Wages) में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। एक ही प्रकार के कार्य के लिए महिला और पुरुष को समान भुगतान मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है। इसके अतिरिक्त, रात की पाली (Night Shift) में काम करने वाली महिलाओं के लिए नियोक्ता को परिवहन और सुरक्षा (Transportation and Security) की पुख्ता व्यवस्था करनी होती है। ये प्रावधान महिलाओं को कार्यबल में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
शिशु गृह (Crèche Facility) की सुविधा उन संस्थानों में अनिवार्य है जहाँ महिला कर्मचारियों की संख्या एक निश्चित सीमा से अधिक है। इससे कामकाजी माताओं (Working Mothers) को अपने बच्चों के निकट रहने और उनकी देखभाल करने में सुविधा होती है। कार्यस्थल पर अलग शौचालय और विश्राम कक्ष की व्यवस्था भी बुनियादी अधिकारों में शामिल है। ये छोटी-छोटी सुविधाएं महिलाओं की उत्पादकता (Productivity) और भागीदारी को बढ़ाती हैं।
महिला श्रमिकों के लिए स्वरोजगार (Self-employment) और सूक्ष्म ऋण की सुविधाएं भी सरकारी योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती हैं। महिला ट्रेड यूनियनों (Women Trade Unions) का बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि अब वे अपने अधिकारों के लिए स्वयं आवाज उठा रही हैं। श्रमिक दिवस हमें याद दिलाता है कि एक न्यायपूर्ण समाज वही है जहाँ महिलाओं के श्रम का मूल्य (Value of Labour) पुरुषों के बराबर समझा जाए। समावेशी विकास (Inclusive Growth) के लिए महिला सशक्तिकरण ही एकमात्र मार्ग है।