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बौद्ध प्रार्थना (Buddhist Prayer) का मुख्य उद्देश्य मन को शांत करना और बुद्ध के गुणों को आत्मसात करना है। प्रार्थना शुरू करने से पहले साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए और अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। प्रार्थना में सबसे पहले 'त्रिशरण' (Three Refuges) का पाठ किया जाता है—बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि। यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि हम ज्ञान, नैतिकता और सद्भाव (Harmony) की शरण ले रहे हैं।

'बुद्धं सरणं गच्छामि' (I go to the Buddha for refuge) का अर्थ केवल प्रतिमा के सामने झुकना नहीं है, बल्कि अपने भीतर छिपी जागृति और बुद्धत्व की संभावना (Potential) को स्वीकार करना है। यह हमें अज्ञानता से मुक्ति की दिशा में अग्रसर करता है। 'धम्मं सरणं गच्छामि' का अर्थ है धर्म या उन नियमों की शरण लेना जो प्रकृति के अनुकूल हैं। यह हमें नैतिक आचरण (Ethical Conduct) और सत्य की राह पर चलने का साहस प्रदान करता है।

'संघं सरणं गच्छामि' (I go to the Sangha for refuge) का अर्थ उस समुदाय की शरण लेना है जो सत्य और न्याय के मार्ग पर चल रहा है। यह एकता (Unity) और सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। बौद्ध प्रार्थनाएं व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता (Humanity) के कल्याण के बारे में सोचने की प्रेरणा देती हैं। इन मंत्रों का नियमित जाप मानसिक विकारों जैसे ईर्ष्या और लोभ को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है।

प्रार्थना के दौरान 'पंचशील' (Five Precepts) का संकल्प लेना भी अनिवार्य माना जाता है। इसमें हिंसा न करने, चोरी न करने, झूठ न बोलने, अनैतिक आचरण से बचने और नशीले पदार्थों (Intoxicants) का त्याग करने का वचन दिया जाता है। यह संकल्प व्यक्ति के चरित्र (Character) को फौलाद जैसा मजबूत बनाता है। प्रार्थना केवल होठों से नहीं बल्कि हृदय की गहराई से होनी चाहिए, तभी उसका आध्यात्मिक प्रभाव (Spiritual Impact) महसूस होता है।

अंत में, 'मेत्ता' (Metta) या मैत्री भावना की प्रार्थना की जाती है जिसमें संसार के सभी प्राणियों के सुखी और स्वस्थ होने की मंगल कामना की जाती है। "सब्वे सत्ता सुखी होन्तु" (May all beings be happy) के मंत्र के साथ प्रार्थना संपन्न होती है। यह वैश्विक प्रेम (Universal Love) का संदेश देता है जो किसी सीमाओं को नहीं मानता। बौद्ध प्रार्थना व्यक्ति को भीतर से शांत और बाहर से परोपकारी बनाने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया (Psychological Process) है।

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बौद्ध प्रार्थना (Buddhist Prayer) का मुख्य उद्देश्य मन को शांत करना और बुद्ध के गुणों को आत्मसात करना है। प्रार्थना शुरू करने से पहले साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए और अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। प्रार्थना में सबसे पहले 'त्रिशरण' (Three Refuges) का पाठ किया जाता है—बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि। यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि हम ज्ञान, नैतिकता और सद्भाव (Harmony) की शरण ले रहे हैं।

'बुद्धं सरणं गच्छामि' (I go to the Buddha for refuge) का अर्थ केवल प्रतिमा के सामने झुकना नहीं है, बल्कि अपने भीतर छिपी जागृति और बुद्धत्व की संभावना (Potential) को स्वीकार करना है। यह हमें अज्ञानता से मुक्ति की दिशा में अग्रसर करता है। 'धम्मं सरणं गच्छामि' का अर्थ है धर्म या उन नियमों की शरण लेना जो प्रकृति के अनुकूल हैं। यह हमें नैतिक आचरण (Ethical Conduct) और सत्य की राह पर चलने का साहस प्रदान करता है।

'संघं सरणं गच्छामि' (I go to the Sangha for refuge) का अर्थ उस समुदाय की शरण लेना है जो सत्य और न्याय के मार्ग पर चल रहा है। यह एकता (Unity) और सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। बौद्ध प्रार्थनाएं व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता (Humanity) के कल्याण के बारे में सोचने की प्रेरणा देती हैं। इन मंत्रों का नियमित जाप मानसिक विकारों जैसे ईर्ष्या और लोभ को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है।

प्रार्थना के दौरान 'पंचशील' (Five Precepts) का संकल्प लेना भी अनिवार्य माना जाता है। इसमें हिंसा न करने, चोरी न करने, झूठ न बोलने, अनैतिक आचरण से बचने और नशीले पदार्थों (Intoxicants) का त्याग करने का वचन दिया जाता है। यह संकल्प व्यक्ति के चरित्र (Character) को फौलाद जैसा मजबूत बनाता है। प्रार्थना केवल होठों से नहीं बल्कि हृदय की गहराई से होनी चाहिए, तभी उसका आध्यात्मिक प्रभाव (Spiritual Impact) महसूस होता है।

अंत में, 'मेत्ता' (Metta) या मैत्री भावना की प्रार्थना की जाती है जिसमें संसार के सभी प्राणियों के सुखी और स्वस्थ होने की मंगल कामना की जाती है। "सब्वे सत्ता सुखी होन्तु" (May all beings be happy) के मंत्र के साथ प्रार्थना संपन्न होती है। यह वैश्विक प्रेम (Universal Love) का संदेश देता है जो किसी सीमाओं को नहीं मानता। बौद्ध प्रार्थना व्यक्ति को भीतर से शांत और बाहर से परोपकारी बनाने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया (Psychological Process) है।
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