गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) ने शांतिनिकेतन (Santiniketan) की स्थापना पारंपरिक शिक्षा प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए की थी। उनका मानना था कि शिक्षा केवल चारदीवारी के भीतर और किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। टैगोर की विचारधारा (Ideology) यह थी कि मनुष्य को प्रकृति के खुले वातावरण में शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ताकि उसका मानसिक और आत्मिक विकास (Spiritual Development) स्वाभाविक रूप से हो सके। उन्होंने खुले आसमान के नीचे पेड़ों के नीचे कक्षाएं चलाने की शुरुआत की, जिसे आज भी वहाँ देखा जा सकता है।
शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण 'पूर्ण मनुष्य' (Complete Human) के निर्माण पर केंद्रित था, जहाँ कला, संगीत और हस्तशिल्प को विज्ञान और गणित के बराबर महत्व दिया गया। शांतिनिकेतन में विश्व-भारती विश्वविद्यालय (Visva-Bharati University) की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य भारत को दुनिया के साथ जोड़ना था। उन्होंने कहा था कि यह एक ऐसा स्थान होगा जहाँ पूरी दुनिया एक घोंसले (Nest) के समान मिल सकेगी। यह अंतरराष्ट्रीयता (Internationalism) और वैश्विक बंधुत्व का एक जीता-जागता उदाहरण बन गया।
टैगोर (Tagore) का मानना था कि बच्चों की रचनात्मकता (Creativity) को दबाना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। उन्होंने शिक्षा में भाषा के महत्व को समझा और मातृभाषा (Mother Tongue) में शिक्षण पर जोर दिया ताकि छात्र विषयों को गहराई से समझ सकें। शांतिनिकेतन में शिक्षक और छात्र के बीच एक पारिवारिक संबंध होता है, जो सीखने की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाता है। यहाँ अनुशासन डंडे के जोर पर नहीं, बल्कि स्व-अनुशासन (Self-discipline) के माध्यम से सिखाया जाता है।
ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता (Self-reliance) भी उनकी शिक्षा का एक अहम हिस्सा था, जिसके लिए उन्होंने श्रीनिकेतन (Sriniketan) की स्थापना की। यहाँ छात्रों को खेती, बुनाई और अन्य ग्रामीण कौशलों का प्रशिक्षण दिया जाता था ताकि वे समाज के उत्थान में योगदान दे सकें। टैगोर चाहते थे कि शिक्षा व्यक्ति को केवल नौकरी पाने के योग्य न बनाए, बल्कि उसे एक संवेदनशील और विचारशील इंसान बनाए। उनकी इस 'सहज शिक्षा' (Easy Education) पद्धति ने दुनिया भर के शिक्षाविदों को प्रभावित किया है।
आज शांतिनिकेतन (Santiniketan) को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) के रूप में मान्यता मिल चुकी है। यह स्थान आज भी टैगोर की उस विरासत को संजोए हुए है जहाँ ज्ञान और प्रकृति का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। यहाँ के त्यौहार जैसे 'बसंत उत्सव' और 'पौष मेला' आज भी उसी सादगी और उमंग के साथ मनाए जाते हैं। गुरुदेव की यह दूरदर्शी सोच (Visionary Thinking) वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करती है, जहाँ मानवता ही सर्वोपरि है।