ईद-उल-अजहा (Eid ul Adha) की नमाज अन्य सामान्य नमाजों से भिन्न होती है क्योंकि यह केवल साल में दो बार पढ़ी जाती है और इसमें जमात (Congregation) का होना अनिवार्य है। नमाज शुरू करने से पहले 'नियत' (Intention) की जाती है कि हम अल्लाह के लिए दो रकात नमाज ईद-उल-अजहा की छह अतिरिक्त तकबीरों (Six Extra Takbeers) के साथ पढ़ रहे हैं। यह इबादत (Worship) सामूहिक रूप से ईदगाह या मस्जिद में सूर्योदय के कुछ समय बाद अदा की जाती है। पहली रकात की शुरुआत में सुब्हानकल्लाहुम्मा (Sana) पढ़ने के बाद इमाम साहब तीन बार हाथ कानों तक उठाकर तकबीर कहते हैं।
तकबीर (Takbeer) कहते समय पहली दो बार हाथ कानों तक उठाकर छोड़ दिए जाते हैं, जबकि तीसरी तकबीर के बाद हाथों को बांध लिया जाता है। इसके बाद इमाम साहब सूरह फातिहा और कोई अन्य कुरआन की आयत (Quranic Verses) पढ़ते हैं और नमाज सामान्य तरीके से रुकू और सजदे तक आगे बढ़ती है। नमाज की यह विशिष्ट विधि (Specific Method) ईश्वर की महानता को बार-बार दोहराने का एक तरीका है। यह हमारे भीतर विनम्रता (Humility) और एकाग्रता (Concentration) को बढ़ाती है।
दूसरी रकात (Second Rakat) में इमाम साहब पहले कुरआन की तिलावत करते हैं और फिर रुकू में जाने से पहले दोबारा तीन अतिरिक्त तकबीरें (Extra Takbeers) कही जाती हैं। इन तीनों तकबीरों में हाथ कानों तक उठाकर छोड़ दिए जाते हैं और चौथी तकबीर पर बिना हाथ उठाए सीधे रुकू (Bowing) में जाया जाता है। यह प्रक्रिया (Process) अल्लाह की बढ़ाई बयान करने और उसके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक माध्यम है। नमाज के इन चरणों को ध्यानपूर्वक पूरा करना इबादत की शुद्धता (Purity of Worship) के लिए आवश्यक है।
नमाज के समापन पर इमाम साहब द्वारा खुतबा (Sermon) दिया जाता है, जो सुनना अनिवार्य (Compulsory) माना जाता है। इस उपदेश में कुर्बानी के नियमों, सामाजिक जिम्मेदारी और हजरत इब्राहिम के बलिदान (Prophet Ibrahim Sacrifice) के बारे में जानकारी दी जाती है। खुतबा सुनते समय बात करना या नमाज छोड़कर जाना वर्जित है। यह आध्यात्मिक शिक्षा (Spiritual Education) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करता है।
दुआ (Supplication) मांगना नमाज का अंतिम और अत्यंत भावुक हिस्सा होता है। लोग अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी (Forgiveness) मांगते हैं और देश व दुनिया में शांति (Peace) और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। नमाज के बाद एक-दूसरे के गले मिलना और 'ईद मुबारक' (Eid Mubarak) कहना आपसी भाईचारे (Mutual Brotherhood) को सुदृढ़ करता है। ईद-उल-अजहा की नमाज (Eid ul Adha Namaz) एक ऐसी इबादत है जो व्यक्ति को ईश्वर और समाज दोनों से जोड़ती है।