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ईद-उल-अजहा (Eid ul Adha) के दिनों में 'तकबीर-ए-तशरीक' (Takbir-e-Tashreeq) का पाठ करना हर मुसलमान के लिए बहुत जरूरी माना गया है। यह तकबीर 9 जुल-हिज्जा की फज्र की नमाज (Fajr Prayer) से शुरू होकर 13 जुल-हिज्जा की असर की नमाज तक पढ़ी जाती है। इन खास दिनों में हर फर्ज नमाज के बाद बुलंद आवाज में 'अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर' कहना अल्लाह की बड़ाई (Greatness of Allah) बयान करने का एक जरिया है। यह इबादत का वह तरीका है जो सीधे रूह (Soul) को सुकून पहुँचाता है।

तकबीर (Eid ul Adha Takbir) के शब्दों का अर्थ बहुत गहरा है, जो यह याद दिलाता है कि पूरी कायनात में केवल अल्लाह ही सबसे बड़ा और इबादत के लायक (Worthy of Worship) है। जब हज़ारों लोग मस्जिद (Mosque) में एक साथ इन शब्दों को दोहराते हैं, तो वह एकता (Unity) का एक अद्भुत नजारा होता है। यह आवाज हमारे भीतर के अहंकार (Ego) को खत्म करती है और खुदा की बंदगी का अहसास (Sense of Devotion) कराती है। इन पांच दिनों को 'अयाम-ए-तशरीक' कहा जाता है।

इस्लामी विद्वानों (Islamic Scholars) के अनुसार, इन तकबीरों का पाठ करना वाजिब (Necessary) है। पुरुष इसे ऊँची आवाज में पढ़ते हैं जबकि महिलाएं धीमी आवाज में इसे दोहराती हैं। तकबीर (Takbir) का सिलसिला न केवल नमाज के बाद बल्कि चलते-फिरते और काम करते हुए भी जारी रखा जा सकता है। यह अभ्यास मन को दुनियावी फिक्रों (Worldly Worries) से हटाकर रूहानियत (Spirituality) की तरफ मोड़ देता है। इससे घर और बाहर का माहौल बरकत (Blessings) वाला बन जाता है।

यह तकबीर (Takbir) हमें पैगंबर इब्राहिम के उस महान बलिदान (Sacrifice) की याद दिलाती है जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर सब कुछ कुर्बान करने का इरादा किया था। इन पवित्र शब्दों को पढ़ना एक तरह का शुक्राना (Thanksgiving) है जो हम अपनी सलामती और ईमान के लिए अदा करते हैं। यह अल्लाह की तौहीद (Oneness) का खुलेआम ऐलान है। बकरीद (Bakrid) की रस्मों में इस ध्वनि का होना वातावरण को पवित्र और ऊर्जायवान (Energetic) बना देता है।

नमाज-ए-ईद (Eid Prayer) के लिए ईदगाह (Eidgah) जाते समय भी रास्ते में तकबीर पढ़ना सुन्नत (Tradition) है। यह सुन्नत हमें अनुशासन (Discipline) और धर्म के प्रति सजगता सिखाती है। जब हम इन अल्फाजों को दिल से महसूस करते हैं, तो हमारे इरादे मजबूत होते हैं और हम नेक कामों (Good Deeds) की तरफ बढ़ते हैं। ईद-उल-अजहा की तकबीर (Eid ul Adha Takbir) वास्तव में एक मोमिन की पहचान और उसकी आस्था का सबसे बुलंद इजहार (Expression of Faith) है।

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ईद-उल-अजहा (Eid ul Adha) के दिनों में 'तकबीर-ए-तशरीक' (Takbir-e-Tashreeq) का पाठ करना हर मुसलमान के लिए बहुत जरूरी माना गया है। यह तकबीर 9 जुल-हिज्जा की फज्र की नमाज (Fajr Prayer) से शुरू होकर 13 जुल-हिज्जा की असर की नमाज तक पढ़ी जाती है। इन खास दिनों में हर फर्ज नमाज के बाद बुलंद आवाज में 'अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर' कहना अल्लाह की बड़ाई (Greatness of Allah) बयान करने का एक जरिया है। यह इबादत का वह तरीका है जो सीधे रूह (Soul) को सुकून पहुँचाता है।

तकबीर (Eid ul Adha Takbir) के शब्दों का अर्थ बहुत गहरा है, जो यह याद दिलाता है कि पूरी कायनात में केवल अल्लाह ही सबसे बड़ा और इबादत के लायक (Worthy of Worship) है। जब हज़ारों लोग मस्जिद (Mosque) में एक साथ इन शब्दों को दोहराते हैं, तो वह एकता (Unity) का एक अद्भुत नजारा होता है। यह आवाज हमारे भीतर के अहंकार (Ego) को खत्म करती है और खुदा की बंदगी का अहसास (Sense of Devotion) कराती है। इन पांच दिनों को 'अयाम-ए-तशरीक' कहा जाता है।

इस्लामी विद्वानों (Islamic Scholars) के अनुसार, इन तकबीरों का पाठ करना वाजिब (Necessary) है। पुरुष इसे ऊँची आवाज में पढ़ते हैं जबकि महिलाएं धीमी आवाज में इसे दोहराती हैं। तकबीर (Takbir) का सिलसिला न केवल नमाज के बाद बल्कि चलते-फिरते और काम करते हुए भी जारी रखा जा सकता है। यह अभ्यास मन को दुनियावी फिक्रों (Worldly Worries) से हटाकर रूहानियत (Spirituality) की तरफ मोड़ देता है। इससे घर और बाहर का माहौल बरकत (Blessings) वाला बन जाता है।

यह तकबीर (Takbir) हमें पैगंबर इब्राहिम के उस महान बलिदान (Sacrifice) की याद दिलाती है जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर सब कुछ कुर्बान करने का इरादा किया था। इन पवित्र शब्दों को पढ़ना एक तरह का शुक्राना (Thanksgiving) है जो हम अपनी सलामती और ईमान के लिए अदा करते हैं। यह अल्लाह की तौहीद (Oneness) का खुलेआम ऐलान है। बकरीद (Bakrid) की रस्मों में इस ध्वनि का होना वातावरण को पवित्र और ऊर्जायवान (Energetic) बना देता है।

नमाज-ए-ईद (Eid Prayer) के लिए ईदगाह (Eidgah) जाते समय भी रास्ते में तकबीर पढ़ना सुन्नत (Tradition) है। यह सुन्नत हमें अनुशासन (Discipline) और धर्म के प्रति सजगता सिखाती है। जब हम इन अल्फाजों को दिल से महसूस करते हैं, तो हमारे इरादे मजबूत होते हैं और हम नेक कामों (Good Deeds) की तरफ बढ़ते हैं। ईद-उल-अजहा की तकबीर (Eid ul Adha Takbir) वास्तव में एक मोमिन की पहचान और उसकी आस्था का सबसे बुलंद इजहार (Expression of Faith) है।
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