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मुहर्रम की दसवीं तारीख को आशूरा (Ashura) कहा जाता है, जो इस्लामी इतिहास का सबसे अधिक भावुक और ऐतिहासिक (Historical) दिन है। इसी दिन इराक के करबला (Karbala) के मैदान में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन (Imam Hussain) और उनके 72 साथियों ने सत्य की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। यह शहादत (Martyrdom) किसी सत्ता की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों (Human Values) और इस्लाम की गरिमा को बचाने के लिए थी। इमाम हुसैन का यह बलिदान अधर्म के खिलाफ धर्म की विजय का सबसे बड़ा उदाहरण है।

करबला की जंग (Battle of Karbala) हमें यह सिखाती है कि चाहे दुश्मन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यजीद की विशाल सेना के सामने इमाम हुसैन (Imam Hussain) का छोटा सा काफिला उनकी वैचारिक शक्ति (Ideological Power) का प्रतीक था। उन्होंने भूख और प्यास की कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। उनका यह धैर्य (Patience) आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह शहादत वीरता (Bravery) और दृढ़ता की एक अमर कहानी है।

आशूरा (Ashura) के दिन पूरी दुनिया में शोक सभाएं और जुलूस (Processions) निकाले जाते हैं। लोग काले वस्त्र धारण कर इमाम हुसैन (Imam Hussain Shahadat) के प्रति अपनी संवेदना (Sympathy) प्रकट करते हैं। इस दिन 'सबिल' (Sabil) लगाई जाती है जहाँ प्यासे लोगों को पानी और शरबत पिलाया जाता है, जो करबला के प्यासे शहीदों की याद दिलाता है। यह मानवता के प्रति करुणा (Compassion for Humanity) दिखाने का दिन है। शहादत का यह संदेश जाति और धर्म की सीमाओं से परे है।

दार्शनिकों और कवियों ने इमाम हुसैन (Imam Hussain) को 'शहीद-ए-आजम' (Greatest Martyr) की उपाधि दी है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि उन्होंने इमाम हुसैन से ही सीखा कि कैसे मजलूम होकर भी विजयी हुआ जा सकता है। आशूरा का दिन हमें सिखाता है कि अत्याचार (Oppression) के खिलाफ आवाज उठाना हर नागरिक का कर्तव्य है। यह दिन आत्म-बलिदान (Self-sacrifice) और सत्यनिष्ठा का उच्चतम शिखर है जिसे मानवता कभी नहीं भुला सकती।

वर्तमान समय में आशूरा (Ashura) का संदेश और भी प्रासंगिक (Relevant) हो गया है। यह हमें आपसी भेदभाव भुलाकर न्याय और शांति (Peace and Justice) के लिए एकजुट होने की प्रेरणा देता है। इमाम हुसैन की शहादत (Imam Hussain Shahadat) हमें याद दिलाती है कि शरीर मिट सकता है लेकिन सत्य का विचार (Idea of Truth) हमेशा जीवित रहता है। यह दिन हर साल हमारे भीतर की सोई हुई चेतना (Consciousness) को जगाने और उसे सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिए तैयार करने का माध्यम है।

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मुहर्रम की दसवीं तारीख को आशूरा (Ashura) कहा जाता है, जो इस्लामी इतिहास का सबसे अधिक भावुक और ऐतिहासिक (Historical) दिन है। इसी दिन इराक के करबला (Karbala) के मैदान में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन (Imam Hussain) और उनके 72 साथियों ने सत्य की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। यह शहादत (Martyrdom) किसी सत्ता की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों (Human Values) और इस्लाम की गरिमा को बचाने के लिए थी। इमाम हुसैन का यह बलिदान अधर्म के खिलाफ धर्म की विजय का सबसे बड़ा उदाहरण है।

करबला की जंग (Battle of Karbala) हमें यह सिखाती है कि चाहे दुश्मन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यजीद की विशाल सेना के सामने इमाम हुसैन (Imam Hussain) का छोटा सा काफिला उनकी वैचारिक शक्ति (Ideological Power) का प्रतीक था। उन्होंने भूख और प्यास की कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। उनका यह धैर्य (Patience) आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह शहादत वीरता (Bravery) और दृढ़ता की एक अमर कहानी है।

आशूरा (Ashura) के दिन पूरी दुनिया में शोक सभाएं और जुलूस (Processions) निकाले जाते हैं। लोग काले वस्त्र धारण कर इमाम हुसैन (Imam Hussain Shahadat) के प्रति अपनी संवेदना (Sympathy) प्रकट करते हैं। इस दिन 'सबिल' (Sabil) लगाई जाती है जहाँ प्यासे लोगों को पानी और शरबत पिलाया जाता है, जो करबला के प्यासे शहीदों की याद दिलाता है। यह मानवता के प्रति करुणा (Compassion for Humanity) दिखाने का दिन है। शहादत का यह संदेश जाति और धर्म की सीमाओं से परे है।

दार्शनिकों और कवियों ने इमाम हुसैन (Imam Hussain) को 'शहीद-ए-आजम' (Greatest Martyr) की उपाधि दी है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि उन्होंने इमाम हुसैन से ही सीखा कि कैसे मजलूम होकर भी विजयी हुआ जा सकता है। आशूरा का दिन हमें सिखाता है कि अत्याचार (Oppression) के खिलाफ आवाज उठाना हर नागरिक का कर्तव्य है। यह दिन आत्म-बलिदान (Self-sacrifice) और सत्यनिष्ठा का उच्चतम शिखर है जिसे मानवता कभी नहीं भुला सकती।

वर्तमान समय में आशूरा (Ashura) का संदेश और भी प्रासंगिक (Relevant) हो गया है। यह हमें आपसी भेदभाव भुलाकर न्याय और शांति (Peace and Justice) के लिए एकजुट होने की प्रेरणा देता है। इमाम हुसैन की शहादत (Imam Hussain Shahadat) हमें याद दिलाती है कि शरीर मिट सकता है लेकिन सत्य का विचार (Idea of Truth) हमेशा जीवित रहता है। यह दिन हर साल हमारे भीतर की सोई हुई चेतना (Consciousness) को जगाने और उसे सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिए तैयार करने का माध्यम है।
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