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आशूरा (Ashura) यानी मुहर्रम की 10वीं तारीख को रोजा (Fasting) रखना इस्लाम में एक अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना गया है। पैगंबर मोहम्मद (Prophet Muhammad) ने मदीना पहुँचने के बाद इस दिन रोजा रखने की सलाह दी थी। धार्मिक मान्यताओं (Religious Beliefs) के अनुसार, इस दिन रोजा रखने से पिछले एक साल के छोटे गुनाह (Sins) माफ हो जाते हैं। यह रोजा केवल भूखा रहना नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि (Purification of Soul) और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक माध्यम है।

सुन्नत (Tradition) के अनुसार, आशूरा का रोजा केवल एक दिन (10 मुहर्रम) का नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसके साथ एक दिन पहले (9 मुहर्रम) या एक दिन बाद (11 मुहर्रम) का रोजा भी जोड़ना चाहिए। इसका उद्देश्य अन्य समुदायों की तुलना में अपनी विशिष्ट पहचान (Specific Identity) बनाए रखना है। यह रोजा रखने से मनुष्य के भीतर धैर्य (Patience) और संयम का विकास होता है। आध्यात्मिक रूप से यह व्यक्ति को अपनी इच्छाओं (Desires) पर नियंत्रण करना सिखाता है।

आशूरा का रोजा (Fasting on Ashura) हमें उन ऐतिहासिक घटनाओं की भी याद दिलाता है जब अल्लाह ने अपने पैगंबरों को बड़ी मुसीबतों से निजात दिलाई थी। इसी दिन हजरत मूसा (Prophet Moses) को फिरौन के अत्याचारों से मुक्ति मिली थी। इस प्रकार यह दिन बुराई के अंत और सत्य की जीत (Victory of Truth) का जश्न मनाने का भी है। आध्यात्मिक शांति (Spiritual Peace) प्राप्त करने के लिए यह दिन दुआ और इबादत के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) दृष्टिकोण से भी रोजा रखने के अनेक लाभ हैं। यह शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालने (Detoxification) में मदद करता है और मानसिक स्पष्टता (Mental Clarity) प्रदान करता है। जब एक मोमिन रोजा रखता है, तो वह भूख और प्यास की शिद्दत को महसूस करता है, जिससे उसके मन में गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति सहानुभूति (Empathy) पैदा होती है। यह सामाजिक चेतना जगाने का एक सशक्त तरीका है।

आशूरा (Ashura) की शाम को जब रोजा खोला जाता है, तो परिवार के साथ मिल-बैठकर दुआ की जाती है। यह समय अल्लाह की रहमतों (Blessings) को प्राप्त करने का होता है। रोजा रखने वाले व्यक्ति के आचरण में विनम्रता (Humility) और सौम्यता आती है। मुहर्रम का यह उपवास हमें याद दिलाता है कि शारीरिक सुख क्षणिक हैं और वास्तविक आनंद ईश्वर की रजा (Will of God) प्राप्त करने में ही निहित है।

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आशूरा (Ashura) यानी मुहर्रम की 10वीं तारीख को रोजा (Fasting) रखना इस्लाम में एक अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना गया है। पैगंबर मोहम्मद (Prophet Muhammad) ने मदीना पहुँचने के बाद इस दिन रोजा रखने की सलाह दी थी। धार्मिक मान्यताओं (Religious Beliefs) के अनुसार, इस दिन रोजा रखने से पिछले एक साल के छोटे गुनाह (Sins) माफ हो जाते हैं। यह रोजा केवल भूखा रहना नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि (Purification of Soul) और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक माध्यम है।

सुन्नत (Tradition) के अनुसार, आशूरा का रोजा केवल एक दिन (10 मुहर्रम) का नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसके साथ एक दिन पहले (9 मुहर्रम) या एक दिन बाद (11 मुहर्रम) का रोजा भी जोड़ना चाहिए। इसका उद्देश्य अन्य समुदायों की तुलना में अपनी विशिष्ट पहचान (Specific Identity) बनाए रखना है। यह रोजा रखने से मनुष्य के भीतर धैर्य (Patience) और संयम का विकास होता है। आध्यात्मिक रूप से यह व्यक्ति को अपनी इच्छाओं (Desires) पर नियंत्रण करना सिखाता है।

आशूरा का रोजा (Fasting on Ashura) हमें उन ऐतिहासिक घटनाओं की भी याद दिलाता है जब अल्लाह ने अपने पैगंबरों को बड़ी मुसीबतों से निजात दिलाई थी। इसी दिन हजरत मूसा (Prophet Moses) को फिरौन के अत्याचारों से मुक्ति मिली थी। इस प्रकार यह दिन बुराई के अंत और सत्य की जीत (Victory of Truth) का जश्न मनाने का भी है। आध्यात्मिक शांति (Spiritual Peace) प्राप्त करने के लिए यह दिन दुआ और इबादत के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) दृष्टिकोण से भी रोजा रखने के अनेक लाभ हैं। यह शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालने (Detoxification) में मदद करता है और मानसिक स्पष्टता (Mental Clarity) प्रदान करता है। जब एक मोमिन रोजा रखता है, तो वह भूख और प्यास की शिद्दत को महसूस करता है, जिससे उसके मन में गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति सहानुभूति (Empathy) पैदा होती है। यह सामाजिक चेतना जगाने का एक सशक्त तरीका है।

आशूरा (Ashura) की शाम को जब रोजा खोला जाता है, तो परिवार के साथ मिल-बैठकर दुआ की जाती है। यह समय अल्लाह की रहमतों (Blessings) को प्राप्त करने का होता है। रोजा रखने वाले व्यक्ति के आचरण में विनम्रता (Humility) और सौम्यता आती है। मुहर्रम का यह उपवास हमें याद दिलाता है कि शारीरिक सुख क्षणिक हैं और वास्तविक आनंद ईश्वर की रजा (Will of God) प्राप्त करने में ही निहित है।
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