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मुहर्रम के महीने को शिया और सुन्नी (Shia and Sunni) दोनों ही समुदाय अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार पूरी श्रद्धा से मनाते हैं। शिया समुदाय (Shia Community) के लिए यह महीना पूरी तरह से इमाम हुसैन की शहादत (Martyrdom) के शोक और मातम का समय होता है। वे पहले मुहर्रम से ही काले कपड़े पहनना शुरू कर देते हैं और इमामबाड़ों में मजलिस (Religious Assemblies) का आयोजन करते हैं। उनका मुख्य जोर करबला के दर्दनाक वाकयात (Painful Events) को बयान करने और गम मनाने पर होता है।

सुन्नी समुदाय (Sunni Community) में मुहर्रम को एक पवित्र महीने (Sacred Month) के रूप में देखा जाता है जिसमें इबादत और रोजों को प्राथमिकता दी जाती है। वे भी इमाम हुसैन और अहले-बैत (Prophet's Family) से बेपनाह मोहब्बत करते हैं और उनकी शहादत को याद करते हैं। सुन्नी परंपरा (Sunni Tradition) में अक्सर खिचड़ा या हलीम का लंगर (Community Feast) बांटा जाता है और गरीबों की मदद की जाती है। वे इस महीने को नया इस्लामी साल (Islamic New Year) होने के नाते इबादत के जरिए शुरू करते हैं।

अज़ादारी (Azadari) के तरीकों में भी अंतर दिखाई देता है, जहाँ शिया भाई जंजीरी मातम (Matam) या सीनाज़नी के जरिए अपनी संवेदना प्रकट करते हैं। दूसरी ओर, सुन्नी भाई अक्सर जुलूस (Processions) निकालते हैं, ताज़िया रखते हैं और फातिहा ख्वानी का इंतजाम करते हैं। दोनों ही फिरकों का मकसद इमाम हुसैन के सिद्धांतों (Principles) को याद करना और यजीद के जुल्म के खिलाफ अपनी आवाज उठाना होता है। यह साझा दुख (Common Grief) ही दोनों समुदायों को एक धागे में पिरोता है।

भारत की गंगा-जमुनी तहजीब (Ganga-Jamuni Culture) में इन दोनों परंपराओं का सुंदर मेल देखने को मिलता है। कई जगहों पर शिया और सुन्नी (Shia and Sunni) एक साथ मिलकर 'सबिल' (Water Distribution) लगाते हैं और प्यासों को पानी पिलाते हैं। वे करबला की जंग (Battle of Karbala) से यह सीख लेते हैं कि हक की राह में कुर्बानी देना सबसे बड़ा धर्म है। भले ही उनके इबादत के तरीके अलग हों, लेकिन इमाम हुसैन के प्रति उनकी अकीदत (Devotion) एक समान और अटूट है।

सांस्कृतिक दृष्टिकोण (Cultural Perspective) से देखें तो मुहर्रम समाज में अनुशासन और भाईचारा (Brotherhood) बढ़ाता है। शिया मजलिसों में मरसिया ख्वानी (Elegies) के जरिए इतिहास को जीवित रखा जाता है, तो सुन्नी तकरीरों में मानवता और सब्र का पाठ पढ़ाया जाता है। यह विविधता (Diversity) भारतीय मुहर्रम की एक बड़ी विशेषता है जहाँ गम और इबादत के अलग-अलग रंग एक साथ नजर आते हैं। मुहर्रम का यह महीना पूरी उम्मत को एक होने और नेकी पर चलने का संदेश देता है।

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मुहर्रम के महीने को शिया और सुन्नी (Shia and Sunni) दोनों ही समुदाय अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार पूरी श्रद्धा से मनाते हैं। शिया समुदाय (Shia Community) के लिए यह महीना पूरी तरह से इमाम हुसैन की शहादत (Martyrdom) के शोक और मातम का समय होता है। वे पहले मुहर्रम से ही काले कपड़े पहनना शुरू कर देते हैं और इमामबाड़ों में मजलिस (Religious Assemblies) का आयोजन करते हैं। उनका मुख्य जोर करबला के दर्दनाक वाकयात (Painful Events) को बयान करने और गम मनाने पर होता है।

सुन्नी समुदाय (Sunni Community) में मुहर्रम को एक पवित्र महीने (Sacred Month) के रूप में देखा जाता है जिसमें इबादत और रोजों को प्राथमिकता दी जाती है। वे भी इमाम हुसैन और अहले-बैत (Prophet's Family) से बेपनाह मोहब्बत करते हैं और उनकी शहादत को याद करते हैं। सुन्नी परंपरा (Sunni Tradition) में अक्सर खिचड़ा या हलीम का लंगर (Community Feast) बांटा जाता है और गरीबों की मदद की जाती है। वे इस महीने को नया इस्लामी साल (Islamic New Year) होने के नाते इबादत के जरिए शुरू करते हैं।

अज़ादारी (Azadari) के तरीकों में भी अंतर दिखाई देता है, जहाँ शिया भाई जंजीरी मातम (Matam) या सीनाज़नी के जरिए अपनी संवेदना प्रकट करते हैं। दूसरी ओर, सुन्नी भाई अक्सर जुलूस (Processions) निकालते हैं, ताज़िया रखते हैं और फातिहा ख्वानी का इंतजाम करते हैं। दोनों ही फिरकों का मकसद इमाम हुसैन के सिद्धांतों (Principles) को याद करना और यजीद के जुल्म के खिलाफ अपनी आवाज उठाना होता है। यह साझा दुख (Common Grief) ही दोनों समुदायों को एक धागे में पिरोता है।

भारत की गंगा-जमुनी तहजीब (Ganga-Jamuni Culture) में इन दोनों परंपराओं का सुंदर मेल देखने को मिलता है। कई जगहों पर शिया और सुन्नी (Shia and Sunni) एक साथ मिलकर 'सबिल' (Water Distribution) लगाते हैं और प्यासों को पानी पिलाते हैं। वे करबला की जंग (Battle of Karbala) से यह सीख लेते हैं कि हक की राह में कुर्बानी देना सबसे बड़ा धर्म है। भले ही उनके इबादत के तरीके अलग हों, लेकिन इमाम हुसैन के प्रति उनकी अकीदत (Devotion) एक समान और अटूट है।

सांस्कृतिक दृष्टिकोण (Cultural Perspective) से देखें तो मुहर्रम समाज में अनुशासन और भाईचारा (Brotherhood) बढ़ाता है। शिया मजलिसों में मरसिया ख्वानी (Elegies) के जरिए इतिहास को जीवित रखा जाता है, तो सुन्नी तकरीरों में मानवता और सब्र का पाठ पढ़ाया जाता है। यह विविधता (Diversity) भारतीय मुहर्रम की एक बड़ी विशेषता है जहाँ गम और इबादत के अलग-अलग रंग एक साथ नजर आते हैं। मुहर्रम का यह महीना पूरी उम्मत को एक होने और नेकी पर चलने का संदेश देता है।
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