मुहर्रम का महीना खुशी मनाने का नहीं बल्कि याद (Remembrance) और सम्मान प्रकट करने का समय है, इसलिए संदेश (Messages) भेजते समय शब्दों का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। लोग अक्सर इस महीने को 'मुबारक' कहने के बजाय 'नया साल' या 'शहादत का महीना' (Month of Martyrdom) कहना पसंद करते हैं। शुभकामनाओं (Wishes) में इमाम हुसैन के बलिदान (Sacrifice) और उनके द्वारा दिखाए गए सत्य के मार्ग का जिक्र होना चाहिए। संदेश ऐसा हो जो सामने वाले के प्रति संवेदना और सम्मान (Respect) व्यक्त करे।
व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर भेजे जाने वाले संदेश (Muharram Wishes) अक्सर शांति और अमन (Peace) की दुआओं से भरे होते हैं। "अल्लाह हमें करबला के शहीदों के नक्श-ए-कदम पर चलने की तौफीक दे" जैसे वाक्य बहुत प्रभावशाली (Effective) होते हैं। यह महीना हमें सिखाता है कि हम दूसरों के हक के लिए खड़े हों और सच्चाई का साथ दें। संदेशों के जरिए लोग अक्सर एक-दूसरे को सब्र और प्रार्थना (Prayer) की याद दिलाते हैं। यह सामाजिक जुड़ाव (Social Connection) बढ़ाने का एक गरिमापूर्ण तरीका है।
डिजिटल कार्ड या कोट्स (Quotes) साझा करते समय यह ध्यान रखें कि उनमें सादगी (Simplicity) हो। बहुत अधिक भड़कीले रंगों या संगीत वाले संदेशों से बचना चाहिए क्योंकि यह शोक का महीना (Mourning Month) है। इमाम हुसैन के कहे हुए अनमोल वचन (Famous Quotes) साझा करना एक बेहतरीन विचार हो सकता है। यह न केवल जानकारी फैलाता है बल्कि लोगों को अपने आचरण में सुधार (Improvement in Conduct) लाने के लिए प्रेरित भी करता है। यह एक प्रकार का वैचारिक प्रचार (Ideological Propagation) है।
दोस्तों और पड़ोसियों को संदेश (Muharram Messages) भेजते समय भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द (Communal Harmony) पर जोर देना चाहिए। "मुहर्रम हमें जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना सिखाता है" जैसे विचार समाज में जागरूकता (Awareness) पैदा करते हैं। कई बार लोग नए हिजरी साल (Hijri Year) की शुरुआत पर अल्लाह से बरकत और सलामती की दुआएं मांगते हैं। यह संदेश एकता (Unity) और विश्वास के धागे को और भी मजबूत करने का काम करते हैं।
इंसानियत के प्रति प्यार और त्याग (Sacrifice and Love) ही मुहर्रम का असली पैगाम है। मुबारकबाद (Wishes) के शब्दों में यह झलकना चाहिए कि हम उस महान इतिहास का हिस्सा हैं जिसने दुनिया को जीने का सलीका सिखाया। संदेश (Messages) भेजकर हम यह बताते हैं कि हम अपनों की खुशियों और दुखों में उनके साथ हैं। मुहर्रम का यह संवाद समाज में संवेदनशीलता (Sensitivity) बढ़ाता है और लोगों को एक-दूसरे के करीब लाता है।