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भारत में मुहर्रम को एक धार्मिक त्यौहार से कहीं अधिक एक सांस्कृतिक उत्सव (Cultural Festival) के रूप में देखा जाता है। इस्लामी शोक का महीना (Islamic Mourning Month) यहाँ की साझा संस्कृति और 'अनेकता में एकता' का जीवंत उदाहरण है। लखनऊ, हैदराबाद और दिल्ली जैसे शहरों में मुहर्रम की मजलिसों और जुलूसों (Processions) में हर मजहब के लोग शामिल होते हैं। यह साझा गम (Shared Grief) लोगों के बीच की धार्मिक दीवारों को गिराकर उन्हें इंसानियत के नाते एक साथ लाता है।

इतिहास गवाह है कि कई हिंदू शासकों और समुदायों ने इमाम हुसैन के प्रति अपनी गहरी अकीदत (Devotion) दिखाई है। 'हुसैनी ब्राह्मण' (Hussaini Brahmins) की परंपरा इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि करबला का दर्द हर दिल का दर्द है। वे इमाम हुसैन को अपना पूर्वज मानते हैं और शोक के महीने (Mourning Month) में अज़ादारी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह सांस्कृतिक एकता (Cultural Unity) भारत की खूबसूरती है जहाँ महापुरुषों के बलिदान को पूरा देश सम्मान देता है।

भारत में ताज़िया (Tazia) बनाने की कला और उसके जुलूस का आयोजन भी एक बड़ा सामाजिक संगम है। ताज़िया बनाने वाले कारीगरों में कई हिंदू भाई भी होते हैं जो इसे पूरी शुद्धता और मेहनत के साथ तैयार करते हैं। लोग 'सबिल' (Water Distribution) पर खड़े होकर प्यासों को पानी और शरबत पिलाते हैं, बिना यह पूछे कि सामने वाला किस धर्म का है। यह सेवा भाव (Service Mindset) मुहर्रम के महीने को एक मानवीय मिशन बना देता है।

शोक के इस महीने (Islamic Mourning Month) में पढ़े जाने वाले मरसिए (Elegies) और नौहे भारतीय भाषाओं जैसे उर्दू और हिंदी के साहित्य (Literature) का गौरव हैं। कई गैर-मुस्लिम कवियों ने इमाम हुसैन की शान में ऐसी कविताएँ लिखी हैं जो आज भी मजलिसों में गूँजती हैं। यह साहित्यिक जुड़ाव (Literary Connection) दर्शाता है कि महान आदर्श किसी एक समुदाय की जागीर नहीं होते। मुहर्रम का महीना हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और दूसरों की भावनाओं का सम्मान (Respect) करना सिखाता है।

आज के समय में जब दूरियां बढ़ रही हैं, मुहर्रम का अनुशासन और शांति (Peace) का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। जुलूसों के दौरान लाखों की भीड़ जिस संयम (Restraint) का परिचय देती है, वह काबिले तारीफ है। इस्लामी शोक का महीना (Islamic Mourning Month) हमें याद दिलाता है कि हमारा इतिहास और हमारी संस्कृति एक-दूसरे में रची-बसी है। इमाम हुसैन की याद में बहने वाले आँसू भारत की एकता (Unity of India) को और भी मजबूत करते हैं।

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भारत में मुहर्रम को एक धार्मिक त्यौहार से कहीं अधिक एक सांस्कृतिक उत्सव (Cultural Festival) के रूप में देखा जाता है। इस्लामी शोक का महीना (Islamic Mourning Month) यहाँ की साझा संस्कृति और 'अनेकता में एकता' का जीवंत उदाहरण है। लखनऊ, हैदराबाद और दिल्ली जैसे शहरों में मुहर्रम की मजलिसों और जुलूसों (Processions) में हर मजहब के लोग शामिल होते हैं। यह साझा गम (Shared Grief) लोगों के बीच की धार्मिक दीवारों को गिराकर उन्हें इंसानियत के नाते एक साथ लाता है।

इतिहास गवाह है कि कई हिंदू शासकों और समुदायों ने इमाम हुसैन के प्रति अपनी गहरी अकीदत (Devotion) दिखाई है। 'हुसैनी ब्राह्मण' (Hussaini Brahmins) की परंपरा इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि करबला का दर्द हर दिल का दर्द है। वे इमाम हुसैन को अपना पूर्वज मानते हैं और शोक के महीने (Mourning Month) में अज़ादारी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह सांस्कृतिक एकता (Cultural Unity) भारत की खूबसूरती है जहाँ महापुरुषों के बलिदान को पूरा देश सम्मान देता है।

भारत में ताज़िया (Tazia) बनाने की कला और उसके जुलूस का आयोजन भी एक बड़ा सामाजिक संगम है। ताज़िया बनाने वाले कारीगरों में कई हिंदू भाई भी होते हैं जो इसे पूरी शुद्धता और मेहनत के साथ तैयार करते हैं। लोग 'सबिल' (Water Distribution) पर खड़े होकर प्यासों को पानी और शरबत पिलाते हैं, बिना यह पूछे कि सामने वाला किस धर्म का है। यह सेवा भाव (Service Mindset) मुहर्रम के महीने को एक मानवीय मिशन बना देता है।

शोक के इस महीने (Islamic Mourning Month) में पढ़े जाने वाले मरसिए (Elegies) और नौहे भारतीय भाषाओं जैसे उर्दू और हिंदी के साहित्य (Literature) का गौरव हैं। कई गैर-मुस्लिम कवियों ने इमाम हुसैन की शान में ऐसी कविताएँ लिखी हैं जो आज भी मजलिसों में गूँजती हैं। यह साहित्यिक जुड़ाव (Literary Connection) दर्शाता है कि महान आदर्श किसी एक समुदाय की जागीर नहीं होते। मुहर्रम का महीना हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और दूसरों की भावनाओं का सम्मान (Respect) करना सिखाता है।

आज के समय में जब दूरियां बढ़ रही हैं, मुहर्रम का अनुशासन और शांति (Peace) का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। जुलूसों के दौरान लाखों की भीड़ जिस संयम (Restraint) का परिचय देती है, वह काबिले तारीफ है। इस्लामी शोक का महीना (Islamic Mourning Month) हमें याद दिलाता है कि हमारा इतिहास और हमारी संस्कृति एक-दूसरे में रची-बसी है। इमाम हुसैन की याद में बहने वाले आँसू भारत की एकता (Unity of India) को और भी मजबूत करते हैं।
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