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जगन्नाथ मंदिर के रत्न सिंहासन (Ratna Singhasana) पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विराजमान होते हैं। इन मूर्तियों (Idols) की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये अधूरी (Incomplete) प्रतीत होती हैं, इनके हाथ और पैर पूर्ण विकसित नहीं हैं। इसके पीछे कथा है कि शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा (Lord Vishwakarma) ने शर्त रखी थी कि वे बंद कमरे में मूर्तियाँ बनाएंगे और कोई उन्हें टोकेगा नहीं, लेकिन राजा के कमरे में प्रवेश करने से वे मूर्तियाँ अधूरी छोड़कर चले गए।

भगवान बलभद्र (Lord Balabhadra) की मूर्ति सफेद रंग (White Color) की होती है, जो ज्ञान और सात्विकता का प्रतीक है। उनकी आँखें बड़ी और अंडाकार (Oval Eyes) होती हैं। वहीं देवी सुभद्रा (Goddess Subhadra) की मूर्ति पीले रंग (Yellow Color) की होती है और वे दोनों भाइयों के बीच में स्थित होती हैं। सुभद्रा जी की मूर्ति में हाथ नहीं दिखाए गए हैं, जो यह संकेत देते हैं कि वे केवल प्रेम और आशीर्वाद (Love and Blessings) का स्वरूप हैं।

मूर्तियों के निर्माण में उपयोग की जाने वाली नीम की लकड़ी (Neem Wood) को 'दारु' कहा जाता है। इन लकड़ियों का चयन करने के लिए विशेष संकेत (Divine Signs) देखे जाते हैं, जैसे कि उस पेड़ पर शंख या चक्र का चिन्ह होना। बलभद्र और सुभद्रा (Balabhadra and Subhadra) की ये प्रतिमाएं हर 12 या 19 साल बाद बदली जाती हैं, जिसे 'नवकालेवर' (Nabakalebara) उत्सव कहा जाता है। पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही दफना दिया जाता है।

मंदिर के भीतर भगवान बलभद्र (Lord Balabhadra) को जगन्नाथ जी के दाईं ओर और सुभद्रा जी को उनके बाईं ओर स्थान दिया गया है। यह क्रम पारिवारिक पदानुक्रम (Family Hierarchy) और सुरक्षा को दर्शाता है। बड़े भाई बलभद्र को शेषनाग का अवतार माना जाता है जो हमेशा अपने छोटे भाई-बहन की रक्षा (Protection) करते हैं। सुभद्रा जी इन दोनों के बीच संतुलन और सौहार्द (Balance and Harmony) की कड़ी का काम करती हैं।

इन मूर्तियों की सादगी (Simplicity) और उनका रूप यह संदेश देता है कि ईश्वर बाहरी सुंदरता के बजाय आंतरिक भाव और भक्ति (Devotion and Inner Feelings) के भूखे हैं। पुरी के इस धाम में बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ की त्रिमूर्ति (Trinity) पूरे विश्व के कल्याण की प्रार्थना करती है। भक्त इन विग्रहों (Deities) के दर्शन करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं। बलभद्र और सुभद्रा (Balabhadra and Subhadra) का साथ यह सिखाता है कि परिवार की एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है।

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जगन्नाथ मंदिर के रत्न सिंहासन (Ratna Singhasana) पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विराजमान होते हैं। इन मूर्तियों (Idols) की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये अधूरी (Incomplete) प्रतीत होती हैं, इनके हाथ और पैर पूर्ण विकसित नहीं हैं। इसके पीछे कथा है कि शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा (Lord Vishwakarma) ने शर्त रखी थी कि वे बंद कमरे में मूर्तियाँ बनाएंगे और कोई उन्हें टोकेगा नहीं, लेकिन राजा के कमरे में प्रवेश करने से वे मूर्तियाँ अधूरी छोड़कर चले गए।

भगवान बलभद्र (Lord Balabhadra) की मूर्ति सफेद रंग (White Color) की होती है, जो ज्ञान और सात्विकता का प्रतीक है। उनकी आँखें बड़ी और अंडाकार (Oval Eyes) होती हैं। वहीं देवी सुभद्रा (Goddess Subhadra) की मूर्ति पीले रंग (Yellow Color) की होती है और वे दोनों भाइयों के बीच में स्थित होती हैं। सुभद्रा जी की मूर्ति में हाथ नहीं दिखाए गए हैं, जो यह संकेत देते हैं कि वे केवल प्रेम और आशीर्वाद (Love and Blessings) का स्वरूप हैं।

मूर्तियों के निर्माण में उपयोग की जाने वाली नीम की लकड़ी (Neem Wood) को 'दारु' कहा जाता है। इन लकड़ियों का चयन करने के लिए विशेष संकेत (Divine Signs) देखे जाते हैं, जैसे कि उस पेड़ पर शंख या चक्र का चिन्ह होना। बलभद्र और सुभद्रा (Balabhadra and Subhadra) की ये प्रतिमाएं हर 12 या 19 साल बाद बदली जाती हैं, जिसे 'नवकालेवर' (Nabakalebara) उत्सव कहा जाता है। पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही दफना दिया जाता है।

मंदिर के भीतर भगवान बलभद्र (Lord Balabhadra) को जगन्नाथ जी के दाईं ओर और सुभद्रा जी को उनके बाईं ओर स्थान दिया गया है। यह क्रम पारिवारिक पदानुक्रम (Family Hierarchy) और सुरक्षा को दर्शाता है। बड़े भाई बलभद्र को शेषनाग का अवतार माना जाता है जो हमेशा अपने छोटे भाई-बहन की रक्षा (Protection) करते हैं। सुभद्रा जी इन दोनों के बीच संतुलन और सौहार्द (Balance and Harmony) की कड़ी का काम करती हैं।

इन मूर्तियों की सादगी (Simplicity) और उनका रूप यह संदेश देता है कि ईश्वर बाहरी सुंदरता के बजाय आंतरिक भाव और भक्ति (Devotion and Inner Feelings) के भूखे हैं। पुरी के इस धाम में बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ की त्रिमूर्ति (Trinity) पूरे विश्व के कल्याण की प्रार्थना करती है। भक्त इन विग्रहों (Deities) के दर्शन करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं। बलभद्र और सुभद्रा (Balabhadra and Subhadra) का साथ यह सिखाता है कि परिवार की एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है।
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