राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) एक वित्तीय वर्ष (financial year) के दौरान सरकार के कुल व्यय (Total Expenditure) और ऋण को छोड़कर कुल प्राप्तियों (Total Receipts excluding borrowing) के बीच का अंतर (difference) होता है। सरल शब्दों में, यह वह राशि (amount) है जो सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए बाजार से या अन्य स्रोतों से उधार (borrow) लेनी पड़ती है। यह घाटा सरकार की वित्तीय अनुशासन (fiscal discipline) और उधार लेने की आवश्यकता को दर्शाता है।
राजकोषीय घाटे की गणना का सूत्र है: राजकोषीय घाटा = कुल व्यय - (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियाँ)
कुल व्यय में राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) और पूंजी व्यय (Capital Expenditure) दोनों शामिल होते हैं। कुल प्राप्तियों में कर (Taxes) और गैर-कर राजस्व (Non-Tax Revenue) के साथ-साथ ऋण वसूली (loan recovery) और विनिवेश (disinvestment) से प्राप्तियाँ शामिल होती हैं, लेकिन उधार को शामिल नहीं किया जाता है।
एक उच्च राजकोषीय घाटा (high fiscal deficit) दर्शाता है कि सरकार अपने नियमित व्यय (regular expenditure) को पूरा करने के लिए भी अधिक उधार ले रही है। इसके कई नकारात्मक परिणाम (negative consequences) हो सकते हैं। सबसे पहले, यह सरकारी ऋण (Government Debt) को बढ़ाता है, जिससे भविष्य में ब्याज भुगतान (interest payments) पर अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है।
उच्च राजकोषीय घाटे का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव महँगाई (Inflation) पर पड़ सकता है। जब सरकार अधिक उधार लेती है और खर्च करती है, तो बाजार में पैसे की आपूर्ति (money supply) बढ़ती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें (prices) बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, सरकार द्वारा बाजार से अधिक उधार लेने पर निजी क्षेत्र (private sector) के लिए ऋण की उपलब्धता (availability of credit) कम हो सकती है, जिसे क्राउडिंग आउट (Crowding Out) प्रभाव कहा जाता है।
भारत में, सरकार राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (Fiscal Responsibility and Budget Management - FRBM Act) के तहत राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के एक निश्चित प्रतिशत (percentage) तक सीमित रखने का प्रयास करती है। राजकोषीय घाटा अक्सर जीडीपी के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है ताकि अर्थव्यवस्था के आकार के सापेक्ष (relative to the size) इसकी गंभीरता (severity) को समझा जा सके।