MS Dhoni ने 30 दिसंबर 2014 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मेलबर्न टेस्ट मैच के बाद अचानक टेस्ट क्रिकेट से संन्यास (Retirement) ले लिया था। उनकी यह घोषणा पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा झटका थी क्योंकि किसी को भी इसकी उम्मीद नहीं थी। धोनी ने यह फैसला उस समय लिया जब वे भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान थे और श्रृंखला अभी बीच में ही थी।
संन्यास के पीछे मुख्य कारण उनका Workload Management (कार्यभार प्रबंधन) और क्रिकेट के छोटे प्रारूपों पर ध्यान केंद्रित करना था। धोनी को लगा कि लगातार तीनों प्रारूपों में कप्तानी और विकेटकीपिंग करने से उनके शरीर पर काफी दबाव पड़ रहा है। वे चाहते थे कि उनकी अनुपस्थिति में विराट कोहली (Virat Kohli) को टेस्ट टीम का नेतृत्व करने और अपनी रणनीति बनाने का पर्याप्त समय मिल सके।
धोनी हमेशा से ही शांत तरीके से विदा लेने में विश्वास रखते थे, इसलिए उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे या विदाई मैच की मांग किए संन्यास लिया। उनके टेस्ट रिकॉर्ड शानदार थे, जिसमें उन्होंने भारत को पहली बार ICC Test Rankings में नंबर वन बनाया था। उन्होंने 90 टेस्ट मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और विकेट के पीछे कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड अपने नाम किए।
उनके इस निर्णय ने यह भी दिखाया कि वे टीम के भविष्य को अपने व्यक्तिगत रिकॉर्ड से ऊपर रखते थे। धोनी का मानना था कि टीम को एक ऐसे कप्तान की जरूरत है जो टेस्ट क्रिकेट को नई ऊर्जा दे सके। संन्यास लेने के बाद भी वे सीमित ओवरों के क्रिकेट में खेलते रहे और युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करते रहे। उनकी यह निस्वार्थ भावना उनके महान व्यक्तित्व को दर्शाती है।
टेस्ट क्रिकेट से उनके जाने के बाद भारतीय टीम में एक खालीपन सा महसूस हुआ, लेकिन उन्होंने जो नींव रखी थी, उस पर विराट कोहली ने एक मजबूत टीम खड़ी की। धोनी का टेस्ट करियर उनकी तकनीकी मजबूती से ज्यादा उनके मानसिक धैर्य (Mental Toughness) के लिए याद किया जाता है। उन्होंने यह साबित किया कि एक सीमित ओवरों का विशेषज्ञ खिलाड़ी भी टेस्ट क्रिकेट की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।