Rohit Sharma (रोहित शर्मा) ने 23 जून 2007 को आयरलैंड के खिलाफ एकदिवसीय मैच से अपना अंतर्राष्ट्रीय पदार्पण किया था। हालांकि, उस मैच में उन्हें बल्लेबाजी करने का मौका नहीं मिला, लेकिन उसी साल दक्षिण अफ्रीका में हुए पहले T20 World Cup में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दबाव वाले मैच में उनकी शानदार अर्धशतकीय पारी ने भारत की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वे रातों-रात चर्चा में आ गए।
अपने करियर के शुरुआती वर्षों में रोहित को बहुत अधिक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। उनमें प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, लेकिन निरंतरता (Consistency) की कमी के कारण उन्हें टीम से अंदर-बाहर होना पड़ता था। कई बार आलोचकों ने उनके शॉट चयन पर सवाल उठाए और उन्हें 'प्रतिभाशाली लेकिन लापरवाह' खिलाड़ी करार दिया। उनके करियर का सबसे दुखद क्षण 2011 World Cup की टीम में न चुना जाना था, जिससे वे मानसिक रूप से काफी टूट गए थे।
उस विफलता के बाद रोहित ने अपनी फिटनेस और मानसिकता पर बहुत काम किया। उन्होंने महसूस किया कि केवल प्रतिभा के दम पर लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टिकना संभव नहीं है। उन्होंने अपनी तकनीक को अधिक दोषरहित बनाया और क्रीज पर समय बिताने को प्राथमिकता दी। चयनकर्ताओं ने भी उन पर भरोसा बनाए रखा और उन्हें मध्यम क्रम से हटाकर सलामी बल्लेबाज (Opening Batsman) के रूप में आज़माया, जो उनके करियर का सबसे बड़ा 'टर्निंग पॉइंट' साबित हुआ।
महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) ने 2013 Champions Trophy में उन्हें ओपनिंग करने का मौका दिया, जिसके बाद रोहित ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शिखर धवन के साथ उनकी जोड़ी ने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। ओपनर बनने के बाद उनकी बल्लेबाजी में एक नई गंभीरता और जिम्मेदारी देखी गई, जिससे वे बड़े स्कोर बनाने में माहिर हो गए। उन्होंने अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत में बदला और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों का सामना निडर होकर किया।
रोहित शर्मा का शुरुआती करियर यह सिखाता है कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती। उन्होंने आलोचनाओं को सकारात्मक रूप से लिया और अपने खेल में सुधार किया। आज जब हम उन्हें रिकॉर्ड तोड़ते हुए देखते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि उन्होंने अपनी जगह बनाने के लिए वर्षों तक संघर्ष किया है। उनकी यह वापसी की कहानी (Comeback Story) खेल जगत के सबसे बेहतरीन उदाहरणों में से एक है।