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Guru Gobind Singh Ji (गुरु गोविंद सिंह जी) ने आनंदपुर साहिब के किले को तब छोड़ने का निर्णय लिया जब मुगल सेना और पहाड़ी राजाओं ने मिलकर महीनों तक किले की Siege (घेराबंदी) कर रखी थी। शत्रुओं ने पवित्र कुरान और गंगा की झूठी कसमें खाई थीं कि यदि गुरु जी किला छोड़ देते हैं, तो उन पर हमला नहीं किया जाएगा। गुरु जी उनकी Deception (धोखाधड़ी) को जानते थे, परंतु सिखों की दयनीय स्थिति और रसद की कमी को देखते हुए उन्होंने 20 दिसंबर 1704 की बर्फीली रात में किला खाली करने का फैसला किया।

जैसे ही गुरु जी का काफिला किले से बाहर निकला, मुगल सेना ने अपनी कसमें तोड़ दीं और पीछे से हमला कर दिया। कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश के बीच गुरु जी और उनके सिख Sarsa River (सरसा नदी) के तट पर पहुँचे। नदी उस समय उफान पर थी और पानी का बहाव अत्यंत Turbulent (भीषण) था। यहाँ सिखों को एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना पड़ा—एक ओर पीछे से आती विशाल शत्रु सेना और दूसरी ओर उफनती हुई नदी की लहरें।

सरसा नदी के इसी संघर्ष के दौरान गुरु जी का परिवार बिखर गया, जिसे इतिहास में Separation of Family (परिवार का बिछोड़ा) कहा जाता है। माता गुजरी जी और दो छोटे साहिबजादे एक तरफ हो गए, जबकि गुरु जी और दो बड़े साहिबजादे दूसरी दिशा में निकल गए। इस अफरातफरी में गुरु जी का बहुत सारा अनमोल Literary Treasure (साहित्यिक खजाना) और प्राचीन पांडुलिपियाँ भी नदी के तेज बहाव में बह गईं, जो सिख इतिहास के लिए एक अपूरणीय क्षति थी।

गुरु जी के परम भक्त भाई जीवन सिंह और अन्य वीर सिखों ने नदी के किनारे मुगल सेना को रोकने के लिए अपनी Supreme Sacrifice (सर्वोच्च बलिदान) दी। उनकी वीरता के कारण ही गुरु जी सुरक्षित नदी पार करने में सफल रहे। सरसा नदी का यह प्रसंग गुरु गोविंद सिंह जी के अदम्य साहस और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उनके Equanimity (धैर्य) का प्रतीक है। भीषण संकट के बीच भी गुरु जी ने अपनी 'नितनेम' (दैनिक प्रार्थना) का परित्याग नहीं किया।

यह घटना सिखाती है कि धर्म के मार्ग पर चलने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। आनंदपुर साहिब के वैभव को त्यागकर और अपने परिवार से बिछड़कर भी गुरु जी ने अकाल पुरख की रजा को ही सर्वोपरि माना। सरसा नदी का वह स्थल आज 'गुरुद्वारा परिवार बिछोड़ा साहिब' के रूप में सुशोभित है, जो हमें गुरु जी के Incredible Strength (अतुलनीय शक्ति) और उनके त्याग की याद दिलाता रहता है।

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Guru Gobind Singh Ji (गुरु गोविंद सिंह जी) ने आनंदपुर साहिब के किले को तब छोड़ने का निर्णय लिया जब मुगल सेना और पहाड़ी राजाओं ने मिलकर महीनों तक किले की Siege (घेराबंदी) कर रखी थी। शत्रुओं ने पवित्र कुरान और गंगा की झूठी कसमें खाई थीं कि यदि गुरु जी किला छोड़ देते हैं, तो उन पर हमला नहीं किया जाएगा। गुरु जी उनकी Deception (धोखाधड़ी) को जानते थे, परंतु सिखों की दयनीय स्थिति और रसद की कमी को देखते हुए उन्होंने 20 दिसंबर 1704 की बर्फीली रात में किला खाली करने का फैसला किया।

जैसे ही गुरु जी का काफिला किले से बाहर निकला, मुगल सेना ने अपनी कसमें तोड़ दीं और पीछे से हमला कर दिया। कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश के बीच गुरु जी और उनके सिख Sarsa River (सरसा नदी) के तट पर पहुँचे। नदी उस समय उफान पर थी और पानी का बहाव अत्यंत Turbulent (भीषण) था। यहाँ सिखों को एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना पड़ा—एक ओर पीछे से आती विशाल शत्रु सेना और दूसरी ओर उफनती हुई नदी की लहरें।

सरसा नदी के इसी संघर्ष के दौरान गुरु जी का परिवार बिखर गया, जिसे इतिहास में Separation of Family (परिवार का बिछोड़ा) कहा जाता है। माता गुजरी जी और दो छोटे साहिबजादे एक तरफ हो गए, जबकि गुरु जी और दो बड़े साहिबजादे दूसरी दिशा में निकल गए। इस अफरातफरी में गुरु जी का बहुत सारा अनमोल Literary Treasure (साहित्यिक खजाना) और प्राचीन पांडुलिपियाँ भी नदी के तेज बहाव में बह गईं, जो सिख इतिहास के लिए एक अपूरणीय क्षति थी।

गुरु जी के परम भक्त भाई जीवन सिंह और अन्य वीर सिखों ने नदी के किनारे मुगल सेना को रोकने के लिए अपनी Supreme Sacrifice (सर्वोच्च बलिदान) दी। उनकी वीरता के कारण ही गुरु जी सुरक्षित नदी पार करने में सफल रहे। सरसा नदी का यह प्रसंग गुरु गोविंद सिंह जी के अदम्य साहस और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उनके Equanimity (धैर्य) का प्रतीक है। भीषण संकट के बीच भी गुरु जी ने अपनी 'नितनेम' (दैनिक प्रार्थना) का परित्याग नहीं किया।

यह घटना सिखाती है कि धर्म के मार्ग पर चलने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। आनंदपुर साहिब के वैभव को त्यागकर और अपने परिवार से बिछड़कर भी गुरु जी ने अकाल पुरख की रजा को ही सर्वोपरि माना। सरसा नदी का वह स्थल आज 'गुरुद्वारा परिवार बिछोड़ा साहिब' के रूप में सुशोभित है, जो हमें गुरु जी के Incredible Strength (अतुलनीय शक्ति) और उनके त्याग की याद दिलाता रहता है।
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