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भारतीय संसद (Indian Parliament) के दो प्रमुख सदन होते हैं जिन्हें लोकसभा (Lower House) और राज्यसभा (Upper House) कहा जाता है। लोकसभा को 'जनता का सदन' माना जाता है क्योंकि इसके सदस्य सीधे आम जनता द्वारा मतदान (Direct Election) के जरिए चुने जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा एक स्थायी सदन (Permanent House) है जिसके सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों (MLAs) द्वारा किया जाता है। लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, जबकि राज्यसभा कभी पूरी तरह भंग नहीं होती और इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

शक्तियों के मामले में लोकसभा अधिक शक्तिशाली प्रतीत होती है, विशेषकर धन विधेयक (Money Bill) के संदर्भ में। कोई भी वित्तीय विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है और राज्यसभा इसे केवल 14 दिनों तक रोक सकती है। प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-confidence Motion) पास हो जाए, तो पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है, जो राज्यसभा के मामले में लागू नहीं होता।

राज्यसभा की भूमिका मुख्य रूप से राज्यों के हितों की रक्षा करना और कानून बनाने की प्रक्रिया में विशेषज्ञ सलाह (Expert Advice) देना है। इसे 'बौद्धिकों का सदन' भी कहा जाता है क्योंकि राष्ट्रपति इसमें कला, विज्ञान और साहित्य जैसे क्षेत्रों से 12 विशिष्ट व्यक्तियों को मनोनीत (Nominate) करते हैं। राज्यसभा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसभा जल्दबाजी में कोई ऐसा कानून न बना दे जो संघीय ढांचे (Federal Structure) के खिलाफ हो। यह सदन निरंतरता बनाए रखने का कार्य करता है।

दोनों सदनों के बीच सामान्य विधेयकों (Ordinary Bills) को लेकर समान अधिकार होते हैं। यदि किसी साधारण कानून पर दोनों सदनों में सहमति न बने, तो राष्ट्रपति संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुला सकते हैं। हालांकि, संयुक्त बैठक में भी संख्या बल अधिक होने के कारण अक्सर लोकसभा का निर्णय ही प्रभावी होता है। संविधान संशोधन (Constitutional Amendment) के मामलों में दोनों सदनों की सहमति अनिवार्य है, जो हमारे लोकतंत्र (Democracy) के संतुलन को दर्शाता है।

निर्वाचन की प्रक्रिया में भी बड़ा अंतर है, जहाँ लोकसभा चुनाव में 18 वर्ष से ऊपर का हर नागरिक वोट डालता है। राज्यसभा चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) पर आधारित होते हैं। लोकसभा सीधे तौर पर सरकार के गठन (Government Formation) और नेतृत्व का फैसला करती है, जबकि राज्यसभा राज्यों की आवाज बनकर केंद्र में संतुलन बनाए रखती है। ये दोनों सदन मिलकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था (Democratic System) के मजबूत स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं।

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भारतीय संसद (Indian Parliament) के दो प्रमुख सदन होते हैं जिन्हें लोकसभा (Lower House) और राज्यसभा (Upper House) कहा जाता है। लोकसभा को 'जनता का सदन' माना जाता है क्योंकि इसके सदस्य सीधे आम जनता द्वारा मतदान (Direct Election) के जरिए चुने जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा एक स्थायी सदन (Permanent House) है जिसके सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों (MLAs) द्वारा किया जाता है। लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, जबकि राज्यसभा कभी पूरी तरह भंग नहीं होती और इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

शक्तियों के मामले में लोकसभा अधिक शक्तिशाली प्रतीत होती है, विशेषकर धन विधेयक (Money Bill) के संदर्भ में। कोई भी वित्तीय विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है और राज्यसभा इसे केवल 14 दिनों तक रोक सकती है। प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-confidence Motion) पास हो जाए, तो पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है, जो राज्यसभा के मामले में लागू नहीं होता।

राज्यसभा की भूमिका मुख्य रूप से राज्यों के हितों की रक्षा करना और कानून बनाने की प्रक्रिया में विशेषज्ञ सलाह (Expert Advice) देना है। इसे 'बौद्धिकों का सदन' भी कहा जाता है क्योंकि राष्ट्रपति इसमें कला, विज्ञान और साहित्य जैसे क्षेत्रों से 12 विशिष्ट व्यक्तियों को मनोनीत (Nominate) करते हैं। राज्यसभा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसभा जल्दबाजी में कोई ऐसा कानून न बना दे जो संघीय ढांचे (Federal Structure) के खिलाफ हो। यह सदन निरंतरता बनाए रखने का कार्य करता है।

दोनों सदनों के बीच सामान्य विधेयकों (Ordinary Bills) को लेकर समान अधिकार होते हैं। यदि किसी साधारण कानून पर दोनों सदनों में सहमति न बने, तो राष्ट्रपति संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुला सकते हैं। हालांकि, संयुक्त बैठक में भी संख्या बल अधिक होने के कारण अक्सर लोकसभा का निर्णय ही प्रभावी होता है। संविधान संशोधन (Constitutional Amendment) के मामलों में दोनों सदनों की सहमति अनिवार्य है, जो हमारे लोकतंत्र (Democracy) के संतुलन को दर्शाता है।

निर्वाचन की प्रक्रिया में भी बड़ा अंतर है, जहाँ लोकसभा चुनाव में 18 वर्ष से ऊपर का हर नागरिक वोट डालता है। राज्यसभा चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) पर आधारित होते हैं। लोकसभा सीधे तौर पर सरकार के गठन (Government Formation) और नेतृत्व का फैसला करती है, जबकि राज्यसभा राज्यों की आवाज बनकर केंद्र में संतुलन बनाए रखती है। ये दोनों सदन मिलकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था (Democratic System) के मजबूत स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं।
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