पुराने समय के गरमागरम बल्ब (Incandescent Bulbs) प्रकाश पैदा करने के लिए बिजली का उपयोग एक टंगस्टन फिलामेंट (Tungsten Filament) को गर्म करने के लिए करते थे। इस प्रक्रिया में लगभग 90 प्रतिशत ऊर्जा गर्मी (Heat) के रूप में बर्बाद हो जाती थी और केवल 10 प्रतिशत ही प्रकाश में बदलती थी। इसके विपरीत, एलईडी (Light Emitting Diode) एक अर्धचालक उपकरण (Semiconductor Device) है जो बिजली को सीधे प्रकाश में बदलता है।
एलईडी के भीतर कोई फिलामेंट नहीं होता जो जलकर रोशनी दे। इसमें इलेक्ट्रॉन एक विशेष सामग्री (Material) से गुजरते हैं और ऊर्जा के छोटे पैकेट छोड़ते हैं जिन्हें फोटॉन (Photons) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में बहुत ही कम ऊष्मा (Minimal Heat) उत्पन्न होती है, जिससे बिजली की लगभग पूरी खपत केवल रोशनी पैदा करने में ही होती है। यही कारण है कि एलईडी बल्ब छूने पर गर्म नहीं होते और बहुत कम वाट (Wattage) में भी तेज रोशनी देते हैं।
स्थायित्व (Durability) के मामले में भी एलईडी बल्ब साधारण बल्बों से बहुत आगे हैं। जहाँ एक पुराना बल्ब 1,000 घंटे चलता था, वहीं एक अच्छी गुणवत्ता वाला एलईडी बल्ब 25,000 से 50,000 घंटे तक चल सकता है। इसमें कोई कांच का नाजुक हिस्सा नहीं होता और न ही कोई तार टूटने (Fusing) का डर रहता है। यह ठोस अवस्था प्रकाशिकी (Solid State Lighting) की तकनीक है जो इसे लंबा जीवन प्रदान करती है।
पर्यावरण (Environment) के लिहाज से भी एलईडी बेहतर विकल्प है। इसमें सीएफएल (CFL) की तरह जहरीला पारा (Mercury) नहीं होता, जिससे इसका निपटान (Disposal) सुरक्षित रहता है। एलईडी बल्ब तुरंत अपनी पूरी चमक के साथ जलते हैं और उन्हें बार-बार चालू-बंद करने से उनकी उम्र पर कोई खास असर नहीं पड़ता। यह ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) का एक आधुनिक चमत्कार (Modern Miracle) है।
बाजार में उपलब्ध विभिन्न रंगों (Colors) के एलईडी बल्ब भी इसी तकनीक का हिस्सा हैं। अर्धचालक सामग्री (Semiconductor Material) को बदलकर अलग-अलग रंगों का प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है। बिजली के बिल (Electricity Bill) को कम करने और कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) को घटाने में एलईडी तकनीक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यह विज्ञान (Science) और किफायत का एक शानदार मेल है।