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राजस्थान के सीकर जिले में आयोजित होने वाला खाटू श्याम जी का वार्षिक लक्खी मेला (Annual Lakhi Mela) मुख्य रूप से फाल्गुन माह (Phalguna Month) की शुक्ल पक्ष की अष्टमी (Ashtami) तिथि से प्रारंभ होकर द्वादशी (Dwadashi) तक चलता है। यह पाँच दिनों का मुख्य उत्सव (Main Festival) होता है, लेकिन भक्तों का आगमन होली (Holi) तक जारी रहता है। मेले के दौरान खाटू नगरी पूरी तरह से भक्ति के रंग में डूबी रहती है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए उमड़ते हैं।

मेले का सबसे महत्वपूर्ण दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी (Ekadashi) माना जाता है, जिसे 'लक्खी एकादशी' (Lakhi Ekadashi) भी कहते हैं। इस विशेष दिन पर माना जाता है कि बाबा श्याम ने अपना शीश (Head) दान किया था। भक्तों की सुविधा के लिए प्रशासन द्वारा महीनों पहले से तैयारियाँ (Preparations) शुरू कर दी जाती हैं। मेले के दौरान मंदिर के पट (Temple Gates) 24 घंटे खुले रहते हैं ताकि हर भक्त को दर्शन का लाभ मिल सके।

भक्तों की लंबी कतारों (Long Queues) को व्यवस्थित करने के लिए कई किलोमीटर तक बैरिकेडिंग (Barricading) की जाती है। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था (Security Arrangements) बहुत कड़ी होती है और हजारों की संख्या में पुलिस बल और स्वयंसेवक (Volunteers) तैनात रहते हैं। मेले के दौरान यहाँ का वातावरण पूरी तरह दिव्य (Divine) हो जाता है, जिसमें चारों ओर जयकारे और भजनों की मधुर ध्वनि गूँजती रहती है।

मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों (Pilgrims) के लिए रहने और खाने के उचित प्रबंध किए जाते हैं। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा नि:शुल्क चिकित्सा (Free Medical) शिविर और विश्राम गृह (Rest Houses) चलाए जाते हैं। फाल्गुन की इस विशेष बेला में राजस्थान की संस्कृति (Culture) और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है।

अंत में, द्वादशी के दिन बाबा श्याम को विशेष भोग (Holy Food Offering) लगाया जाता है, जिसके बाद मेले का आधिकारिक समापन होता है। हालांकि, भक्त इसके बाद भी कई दिनों तक आते रहते हैं। मेले का यह समय आध्यात्मिक शांति (Spiritual Peace) और मनोकामना पूर्ति (Wishes Fulfillment) के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, जहाँ हर कोई 'हारे का सहारा' के चरणों में शीश नवाता है।

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राजस्थान के सीकर जिले में आयोजित होने वाला खाटू श्याम जी का वार्षिक लक्खी मेला (Annual Lakhi Mela) मुख्य रूप से फाल्गुन माह (Phalguna Month) की शुक्ल पक्ष की अष्टमी (Ashtami) तिथि से प्रारंभ होकर द्वादशी (Dwadashi) तक चलता है। यह पाँच दिनों का मुख्य उत्सव (Main Festival) होता है, लेकिन भक्तों का आगमन होली (Holi) तक जारी रहता है। मेले के दौरान खाटू नगरी पूरी तरह से भक्ति के रंग में डूबी रहती है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए उमड़ते हैं।

मेले का सबसे महत्वपूर्ण दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी (Ekadashi) माना जाता है, जिसे 'लक्खी एकादशी' (Lakhi Ekadashi) भी कहते हैं। इस विशेष दिन पर माना जाता है कि बाबा श्याम ने अपना शीश (Head) दान किया था। भक्तों की सुविधा के लिए प्रशासन द्वारा महीनों पहले से तैयारियाँ (Preparations) शुरू कर दी जाती हैं। मेले के दौरान मंदिर के पट (Temple Gates) 24 घंटे खुले रहते हैं ताकि हर भक्त को दर्शन का लाभ मिल सके।

भक्तों की लंबी कतारों (Long Queues) को व्यवस्थित करने के लिए कई किलोमीटर तक बैरिकेडिंग (Barricading) की जाती है। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था (Security Arrangements) बहुत कड़ी होती है और हजारों की संख्या में पुलिस बल और स्वयंसेवक (Volunteers) तैनात रहते हैं। मेले के दौरान यहाँ का वातावरण पूरी तरह दिव्य (Divine) हो जाता है, जिसमें चारों ओर जयकारे और भजनों की मधुर ध्वनि गूँजती रहती है।

मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों (Pilgrims) के लिए रहने और खाने के उचित प्रबंध किए जाते हैं। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा नि:शुल्क चिकित्सा (Free Medical) शिविर और विश्राम गृह (Rest Houses) चलाए जाते हैं। फाल्गुन की इस विशेष बेला में राजस्थान की संस्कृति (Culture) और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है।

अंत में, द्वादशी के दिन बाबा श्याम को विशेष भोग (Holy Food Offering) लगाया जाता है, जिसके बाद मेले का आधिकारिक समापन होता है। हालांकि, भक्त इसके बाद भी कई दिनों तक आते रहते हैं। मेले का यह समय आध्यात्मिक शांति (Spiritual Peace) और मनोकामना पूर्ति (Wishes Fulfillment) के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, जहाँ हर कोई 'हारे का सहारा' के चरणों में शीश नवाता है।
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