भगवान खाटू श्याम जी को 'हारे का सहारा' कहने के पीछे एक बहुत ही गहरी और प्रेरणादायक कहानी है। वे वास्तव में पांडु पुत्र भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक (Barbarik) हैं। बर्बरीक बचपन से ही बहुत वीर और महान धनुर्धर थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे महाभारत (Mahabharata) के युद्ध में केवल उसी पक्ष से लड़ेंगे जो पक्ष हार रहा होगा।
जब भगवान कृष्ण (Lord Krishna) को इस प्रतिज्ञा के बारे में पता चला, तो उन्होंने सोचा कि यदि बर्बरीक हारने वाले पक्ष की ओर से लड़े, तो युद्ध कभी समाप्त ही नहीं होगा। तब श्री कृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और बर्बरीक से उनका शीश (Head) दान में मांग लिया। बर्बरीक ने खुशी-खुशी अपना शीश दान कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया।
कृष्ण ने बर्बरीक को अपना नाम 'श्याम' प्रदान किया और कहा कि कलियुग (Kaliyug) में लोग उन्हें इसी नाम से पूजेंगे। भगवान ने वचन दिया कि जो भी भक्त अपने जीवन में दुखी या हार चुका होगा, वह यदि सच्चे मन से श्याम बाबा को पुकारेगा, तो वे उसकी सहायता अवश्य करेंगे। इसी कारण उन्हें 'हारे का सहारा' कहा जाने लगा।
पौराणिक मान्यताओं (Ancient Beliefs) के अनुसार, बर्बरीक का शीश आज के खाटू क्षेत्र में एक कुण्ड में मिला था, जिसे अब 'श्याम कुण्ड' (Shyam Kund) के नाम से जाना जाता है। मंदिर की स्थापना के बाद से ही भक्तों में यह विश्वास अटूट है कि यहाँ आने वाला कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता। बाबा श्याम सबके दुख हर लेते हैं।
आज भी भक्त अपनी परेशानियों (Problems) और दुखों से हारकर जब खाटू की चौखट पर आते हैं, तो उन्हें शांति और समाधान मिलता है। यह स्थान न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि लाखों लोगों की उम्मीदों का भी आधार है। यहाँ की मिट्टी और हवा में भी भक्तों को दिव्य शक्ति (Divine Power) का अनुभव होता है।