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लोहड़ी के उत्सव में "सुंदर मुंदरिये" (Sunder Mundriye) गीत को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है क्योंकि यह पंजाब के नायक (Hero of Punjab) दुल्ला भट्टी को समर्पित है। यह गीत मुगल काल की एक घटना पर आधारित है जहाँ दुल्ला भट्टी ने दो अनाथ लड़कियों, सुंदरी और मुंदरी को दासता से बचाया था। उन्होंने पिता का दायित्व निभाते हुए जंगल में ही अग्नि जलाकर उनका कन्यादान (Kanyadaan) किया था। यह कहानी वीरता (Heroism) और महिलाओं के सम्मान की रक्षा करने की एक महान मिसाल पेश करती है।

गीत के बोल "दुल्ला भट्टी वाला हो, सेर शक्कर पाई हो" उस सादगी और प्रेम को दर्शाते हैं जिसके साथ दुल्ला भट्टी ने विवाह संपन्न कराया था। उनके पास देने के लिए कोई बहुमूल्य आभूषण नहीं थे, इसलिए उन्होंने उपहार (Gift) के रूप में केवल एक सेर शक्कर भेंट की थी। आज भी लोहड़ी की शाम लोग इसी गीत को गाकर उस महान योद्धा को अपनी श्रद्धांजलि (Tribute) अर्पित करते हैं। यह गीत हमें सिखाता है कि समाज के कमज़ोर वर्गों की सहायता करना ही सबसे बड़ा धर्म (Dharma) है।

इस गीत का गायन सामूहिक रूप से किया जाता है, जहाँ एक व्यक्ति मुख्य पंक्तियाँ गाता है और बाकी समूह "हो" (Ho) की गूँज के साथ प्रतिक्रिया देता है। यह इंटरैक्टिव शैली (Interactive Style) लोहड़ी की सभा को अत्यंत सक्रिय और जीवंत बना देती है। "सुंदर मुंदरिये" गीत के माध्यम से दुल्ला भट्टी का चरित्र एक रक्षक (Protector) और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आता है। यह लोकगाथा (Folklore) पीढ़ियों से पंजाब के घर-घर में सुनाई और गाई जा रही है।

ऐतिहासिक रूप से (Historically), यह गीत विद्रोह और संघर्ष का भी प्रतीक है क्योंकि दुल्ला भट्टी ने अत्याचारी ज़मींदारों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी। लोकगीतों (Lohri Songs) में ऐसी कहानियों का होना यह सुनिश्चित करता है कि हमारे पूर्वजों का गौरवशाली इतिहास (Glorious History) विस्मृत न हो। जब बच्चे इस गीत को गाते हुए लोहड़ी मांगते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी संस्कृति (Culture) के सबसे महत्वपूर्ण पाठ को आत्मसात कर रहे होते हैं। यह गीत उत्सव के धार्मिक पक्ष के साथ-साथ इसके सामाजिक महत्व को भी रेखांकित करता है।

आधुनिक लोहड़ी समारोहों में भी इस गीत का महत्व (Importance) कम नहीं हुआ है, बल्कि अब इसे नए संगीत संपादन (Music Editing) के साथ सुना जाता है। डीजे (DJ) और लाउडस्पीकर्स पर भी जब यह धुन बजती है, तो लोग पारंपरिक भांगड़ा (Traditional Bhangra) करने के लिए स्वयमेव प्रेरित हो जाते हैं। यह गीत लोहड़ी की पहचान बन चुका है और इसके बिना अलाव की रोशनी अधूरी सी लगती है। दुल्ला भट्टी की यह अमर कहानी गीतों के माध्यम से सदा के लिए हमारे दिलों में अंकित (Imprinted) हो गई है।

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लोहड़ी के उत्सव में "सुंदर मुंदरिये" (Sunder Mundriye) गीत को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है क्योंकि यह पंजाब के नायक (Hero of Punjab) दुल्ला भट्टी को समर्पित है। यह गीत मुगल काल की एक घटना पर आधारित है जहाँ दुल्ला भट्टी ने दो अनाथ लड़कियों, सुंदरी और मुंदरी को दासता से बचाया था। उन्होंने पिता का दायित्व निभाते हुए जंगल में ही अग्नि जलाकर उनका कन्यादान (Kanyadaan) किया था। यह कहानी वीरता (Heroism) और महिलाओं के सम्मान की रक्षा करने की एक महान मिसाल पेश करती है।

गीत के बोल "दुल्ला भट्टी वाला हो, सेर शक्कर पाई हो" उस सादगी और प्रेम को दर्शाते हैं जिसके साथ दुल्ला भट्टी ने विवाह संपन्न कराया था। उनके पास देने के लिए कोई बहुमूल्य आभूषण नहीं थे, इसलिए उन्होंने उपहार (Gift) के रूप में केवल एक सेर शक्कर भेंट की थी। आज भी लोहड़ी की शाम लोग इसी गीत को गाकर उस महान योद्धा को अपनी श्रद्धांजलि (Tribute) अर्पित करते हैं। यह गीत हमें सिखाता है कि समाज के कमज़ोर वर्गों की सहायता करना ही सबसे बड़ा धर्म (Dharma) है।

इस गीत का गायन सामूहिक रूप से किया जाता है, जहाँ एक व्यक्ति मुख्य पंक्तियाँ गाता है और बाकी समूह "हो" (Ho) की गूँज के साथ प्रतिक्रिया देता है। यह इंटरैक्टिव शैली (Interactive Style) लोहड़ी की सभा को अत्यंत सक्रिय और जीवंत बना देती है। "सुंदर मुंदरिये" गीत के माध्यम से दुल्ला भट्टी का चरित्र एक रक्षक (Protector) और न्यायप्रिय व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आता है। यह लोकगाथा (Folklore) पीढ़ियों से पंजाब के घर-घर में सुनाई और गाई जा रही है।

ऐतिहासिक रूप से (Historically), यह गीत विद्रोह और संघर्ष का भी प्रतीक है क्योंकि दुल्ला भट्टी ने अत्याचारी ज़मींदारों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी। लोकगीतों (Lohri Songs) में ऐसी कहानियों का होना यह सुनिश्चित करता है कि हमारे पूर्वजों का गौरवशाली इतिहास (Glorious History) विस्मृत न हो। जब बच्चे इस गीत को गाते हुए लोहड़ी मांगते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी संस्कृति (Culture) के सबसे महत्वपूर्ण पाठ को आत्मसात कर रहे होते हैं। यह गीत उत्सव के धार्मिक पक्ष के साथ-साथ इसके सामाजिक महत्व को भी रेखांकित करता है।

आधुनिक लोहड़ी समारोहों में भी इस गीत का महत्व (Importance) कम नहीं हुआ है, बल्कि अब इसे नए संगीत संपादन (Music Editing) के साथ सुना जाता है। डीजे (DJ) और लाउडस्पीकर्स पर भी जब यह धुन बजती है, तो लोग पारंपरिक भांगड़ा (Traditional Bhangra) करने के लिए स्वयमेव प्रेरित हो जाते हैं। यह गीत लोहड़ी की पहचान बन चुका है और इसके बिना अलाव की रोशनी अधूरी सी लगती है। दुल्ला भट्टी की यह अमर कहानी गीतों के माध्यम से सदा के लिए हमारे दिलों में अंकित (Imprinted) हो गई है।
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