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अरावली पर्वत श्रृंखला (Aravali Mountain Chain) थार मरुस्थल (Thar Desert) और गंगा के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक दीवार (Natural Barrier) के रूप में खड़ी है। जब पत्थरों के खनन (Stone Mining) के लिए इन पहाड़ियों को समतल कर दिया जाता है, तो यह दीवार कमजोर हो जाती है, जिससे रेगिस्तानी रेत को आगे बढ़ने का रास्ता मिल जाता है। पहाड़ियों के बीच बने ये अंतराल (Gaps) धूल भरी आँधियों (Dust Storms) को मैदानी इलाकों तक पहुँचाने में मदद करते हैं। यह प्रक्रिया सीधे तौर पर मरुस्थलीकरण (Desertification) को बढ़ावा दे रही है जो कृषि भूमि को नष्ट कर सकती है।

खराब वानिकी और पहाड़ों के कटाव के कारण नमी सोखने वाली वनस्पतियाँ (Vegetation) खत्म हो रही हैं, जिससे वातावरण में शुष्कता (Aridity) बढ़ रही है। पेड़-पौधे हवा की गति को धीमा करते हैं, लेकिन खनन (Mining) के कारण नग्न हुई जमीन पर हवा का वेग बहुत अधिक होता है, जो उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत को उड़ा ले जाता है। मिट्टी के इस कटाव (Soil Erosion) से ज़मीन बंजर होती जा रही है और खेती की पैदावार में भारी कमी आई है। अरावली की सुरक्षा के बिना मरुस्थल का विस्तार रोकना लगभग असंभव कार्य है।

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के इस दौर में अरावली की पहाड़ियाँ वर्षा लाने वाले बादलों को रोकने में सहायक होती थीं, लेकिन अब इनका आकार छोटा होने से वर्षा का पैटर्न (Rainfall Pattern) बदल गया है। कम बारिश और बढ़ती गर्मी मरुस्थलीय परिस्थितियों को और भी अनुकूल बनाती हैं। खनन (Mining) क्षेत्रों के आसपास का तापमान अक्सर सामान्य से अधिक रहता है, जो ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के स्थानीय प्रभाव को तेज करता है। यह असंतुलन भविष्य में पूरे क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में धूल के कणों (Aerosols) की अधिकता का एक बड़ा कारण अरावली में होने वाली खुदाई और पहाड़ों का गायब होना है। जब प्राकृतिक अवरोध (Physical Barrier) हट जाता है, तो मरुस्थलीय हवाएँ बिना किसी रुकावट के शहरी आबादी तक पहुँचती हैं। इसके कारण न केवल दृश्यता (Visibility) कम होती है, बल्कि सांस से जुड़ी बीमारियाँ भी बढ़ती हैं। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की इस क्षति को केवल सघन वृक्षारोपण और खनन पर पूर्ण रोक लगाकर ही सुधारा जा सकता है।

सरकार को अरावली को एक 'संरक्षित क्षेत्र' (Protected Area) के रूप में विकसित करना चाहिए ताकि मरुस्थलीकरण के इस खतरे को टाला जा सके। 'ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट' (Green Wall Project) जैसी पहल तभी सफल हो सकती है जब पहाड़ियों का मूल स्वरूप सुरक्षित रहे। यदि खनन (Mining) इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले दशकों में उपजाऊ मैदान भी रेत के टीलों में बदल जाएंगे। अरावली की रक्षा करना मरुस्थल के खिलाफ हमारी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई है जिसे जीतना अनिवार्य है।

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अरावली पर्वत श्रृंखला (Aravali Mountain Chain) थार मरुस्थल (Thar Desert) और गंगा के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक दीवार (Natural Barrier) के रूप में खड़ी है। जब पत्थरों के खनन (Stone Mining) के लिए इन पहाड़ियों को समतल कर दिया जाता है, तो यह दीवार कमजोर हो जाती है, जिससे रेगिस्तानी रेत को आगे बढ़ने का रास्ता मिल जाता है। पहाड़ियों के बीच बने ये अंतराल (Gaps) धूल भरी आँधियों (Dust Storms) को मैदानी इलाकों तक पहुँचाने में मदद करते हैं। यह प्रक्रिया सीधे तौर पर मरुस्थलीकरण (Desertification) को बढ़ावा दे रही है जो कृषि भूमि को नष्ट कर सकती है।

खराब वानिकी और पहाड़ों के कटाव के कारण नमी सोखने वाली वनस्पतियाँ (Vegetation) खत्म हो रही हैं, जिससे वातावरण में शुष्कता (Aridity) बढ़ रही है। पेड़-पौधे हवा की गति को धीमा करते हैं, लेकिन खनन (Mining) के कारण नग्न हुई जमीन पर हवा का वेग बहुत अधिक होता है, जो उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत को उड़ा ले जाता है। मिट्टी के इस कटाव (Soil Erosion) से ज़मीन बंजर होती जा रही है और खेती की पैदावार में भारी कमी आई है। अरावली की सुरक्षा के बिना मरुस्थल का विस्तार रोकना लगभग असंभव कार्य है।

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के इस दौर में अरावली की पहाड़ियाँ वर्षा लाने वाले बादलों को रोकने में सहायक होती थीं, लेकिन अब इनका आकार छोटा होने से वर्षा का पैटर्न (Rainfall Pattern) बदल गया है। कम बारिश और बढ़ती गर्मी मरुस्थलीय परिस्थितियों को और भी अनुकूल बनाती हैं। खनन (Mining) क्षेत्रों के आसपास का तापमान अक्सर सामान्य से अधिक रहता है, जो ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के स्थानीय प्रभाव को तेज करता है। यह असंतुलन भविष्य में पूरे क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में धूल के कणों (Aerosols) की अधिकता का एक बड़ा कारण अरावली में होने वाली खुदाई और पहाड़ों का गायब होना है। जब प्राकृतिक अवरोध (Physical Barrier) हट जाता है, तो मरुस्थलीय हवाएँ बिना किसी रुकावट के शहरी आबादी तक पहुँचती हैं। इसके कारण न केवल दृश्यता (Visibility) कम होती है, बल्कि सांस से जुड़ी बीमारियाँ भी बढ़ती हैं। पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की इस क्षति को केवल सघन वृक्षारोपण और खनन पर पूर्ण रोक लगाकर ही सुधारा जा सकता है।

सरकार को अरावली को एक 'संरक्षित क्षेत्र' (Protected Area) के रूप में विकसित करना चाहिए ताकि मरुस्थलीकरण के इस खतरे को टाला जा सके। 'ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट' (Green Wall Project) जैसी पहल तभी सफल हो सकती है जब पहाड़ियों का मूल स्वरूप सुरक्षित रहे। यदि खनन (Mining) इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले दशकों में उपजाऊ मैदान भी रेत के टीलों में बदल जाएंगे। अरावली की रक्षा करना मरुस्थल के खिलाफ हमारी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई है जिसे जीतना अनिवार्य है।
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