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अरावली की पहाड़ियों को खनन माफियाओं (Mining Mafias) से बचाने के लिए साल 2026 में एक अत्याधुनिक और एकीकृत निगरानी प्रणाली (Integrated Monitoring System) लागू की गई है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद, अब राजस्थान और हरियाणा के संवेदनशील इलाकों में 'रियल-टाइम' (Real-time) उपग्रह निगरानी की जा रही है। यदि किसी भी प्रतिबंधित क्षेत्र में कोई संदिग्ध गतिविधि या पहाड़ों की कटाई होती है, तो स्वचालित रूप से संबंधित अधिकारियों के पास अलर्ट (Alert) पहुँच जाता है। इससे मानवीय लापरवाही की गुंजाइश कम हो गई है।

नई प्रणाली के तहत, अरावली के प्रमुख माइनिंग हब्स (Mining Hubs) में नाइट-विज़न ड्रोन (Night-vision Drones) तैनात किए गए हैं, जो रात के अंधेरे में होने वाले अवैध उत्खनन को पकड़ने में सक्षम हैं। साथ ही, सीमावर्ती रास्तों पर सीसीटीवी कैमरों (CCTV Cameras) और ई-चालान (e-Challan) सिस्टम को मज़बूत किया गया है ताकि बिना अनुमति के पत्थरों की ढुलाई करने वाले वाहनों को तुरंत जब्त किया जा सके। यह तकनीकी निगरानी (Technical Surveillance) जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने में बहुत प्रभावी साबित हो रही है।

जिला स्तर पर 'अरावली टास्क फोर्स' (Aravali Task Force) का पुनर्गठन किया गया है, जिसमें पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए हैं। अब किसी भी अवैध माइनिंग साइट (Mining Site) पर छापा मारने के लिए मुख्यालय से लंबी अनुमति की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। इसके अलावा, स्थानीय लोगों के लिए एक मोबाइल ऐप और हेल्पलाइन नंबर (Helpline Number) जारी किया गया है, जिस पर वे गुप्त रूप से अवैध गतिविधियों की जानकारी दे सकते हैं। जन भागीदारी (Public Participation) से निगरानी का दायरा और बढ़ गया है।

सरकार अब खनन पट्टों की नीलामी (Auction) और संचालन के लिए एक पारदर्शी पोर्टल का उपयोग कर रही है, जहाँ हर वैध खदान की भौगोलिक सीमाएँ (Geo-fencing) स्पष्ट रूप से अंकित हैं। यदि कोई लीज धारक अपनी सीमा से बाहर जाकर खुदाई करता है, तो उसका लाइसेंस तुरंत रद्द करने का प्रावधान है। 'सतत खनन योजना' (Sustainable Mining Plan) के तहत अब यह अनिवार्य कर दिया गया है कि जहाँ से पत्थर निकाले जाएँ, वहाँ साथ-साथ वनीकरण (Afforestation) भी किया जाए।

इतने सख्त कदमों के बावजूद, अरावली के दुर्गम इलाकों में अभी भी छिटपुट अवैध खनन की खबरें आती रहती हैं। प्रशासन का लक्ष्य है कि 2026 के अंत तक 'जीरो इलीगल माइनिंग' (Zero Illegal Mining) का लक्ष्य हासिल किया जा सके। इसके लिए आधुनिक सेंसर आधारित 'क्रशर मॉनिटरिंग' भी शुरू की गई है ताकि अवैध पत्थरों की सप्लाई चेन को तोड़ा जा सके। अरावली का संरक्षण अब केवल कागजों पर नहीं, बल्कि डिजिटल और सक्रिय निगरानी (Active Surveillance) के जरिए जमीन पर भी नजर आने लगा है।

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अरावली की पहाड़ियों को खनन माफियाओं (Mining Mafias) से बचाने के लिए साल 2026 में एक अत्याधुनिक और एकीकृत निगरानी प्रणाली (Integrated Monitoring System) लागू की गई है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद, अब राजस्थान और हरियाणा के संवेदनशील इलाकों में 'रियल-टाइम' (Real-time) उपग्रह निगरानी की जा रही है। यदि किसी भी प्रतिबंधित क्षेत्र में कोई संदिग्ध गतिविधि या पहाड़ों की कटाई होती है, तो स्वचालित रूप से संबंधित अधिकारियों के पास अलर्ट (Alert) पहुँच जाता है। इससे मानवीय लापरवाही की गुंजाइश कम हो गई है।

नई प्रणाली के तहत, अरावली के प्रमुख माइनिंग हब्स (Mining Hubs) में नाइट-विज़न ड्रोन (Night-vision Drones) तैनात किए गए हैं, जो रात के अंधेरे में होने वाले अवैध उत्खनन को पकड़ने में सक्षम हैं। साथ ही, सीमावर्ती रास्तों पर सीसीटीवी कैमरों (CCTV Cameras) और ई-चालान (e-Challan) सिस्टम को मज़बूत किया गया है ताकि बिना अनुमति के पत्थरों की ढुलाई करने वाले वाहनों को तुरंत जब्त किया जा सके। यह तकनीकी निगरानी (Technical Surveillance) जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने में बहुत प्रभावी साबित हो रही है।

जिला स्तर पर 'अरावली टास्क फोर्स' (Aravali Task Force) का पुनर्गठन किया गया है, जिसमें पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए हैं। अब किसी भी अवैध माइनिंग साइट (Mining Site) पर छापा मारने के लिए मुख्यालय से लंबी अनुमति की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। इसके अलावा, स्थानीय लोगों के लिए एक मोबाइल ऐप और हेल्पलाइन नंबर (Helpline Number) जारी किया गया है, जिस पर वे गुप्त रूप से अवैध गतिविधियों की जानकारी दे सकते हैं। जन भागीदारी (Public Participation) से निगरानी का दायरा और बढ़ गया है।

सरकार अब खनन पट्टों की नीलामी (Auction) और संचालन के लिए एक पारदर्शी पोर्टल का उपयोग कर रही है, जहाँ हर वैध खदान की भौगोलिक सीमाएँ (Geo-fencing) स्पष्ट रूप से अंकित हैं। यदि कोई लीज धारक अपनी सीमा से बाहर जाकर खुदाई करता है, तो उसका लाइसेंस तुरंत रद्द करने का प्रावधान है। 'सतत खनन योजना' (Sustainable Mining Plan) के तहत अब यह अनिवार्य कर दिया गया है कि जहाँ से पत्थर निकाले जाएँ, वहाँ साथ-साथ वनीकरण (Afforestation) भी किया जाए।

इतने सख्त कदमों के बावजूद, अरावली के दुर्गम इलाकों में अभी भी छिटपुट अवैध खनन की खबरें आती रहती हैं। प्रशासन का लक्ष्य है कि 2026 के अंत तक 'जीरो इलीगल माइनिंग' (Zero Illegal Mining) का लक्ष्य हासिल किया जा सके। इसके लिए आधुनिक सेंसर आधारित 'क्रशर मॉनिटरिंग' भी शुरू की गई है ताकि अवैध पत्थरों की सप्लाई चेन को तोड़ा जा सके। अरावली का संरक्षण अब केवल कागजों पर नहीं, बल्कि डिजिटल और सक्रिय निगरानी (Active Surveillance) के जरिए जमीन पर भी नजर आने लगा है।
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