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भारतीय संविधान (Indian Constitution) के निर्माण की प्रक्रिया 24 जनवरी 1950 को अपने अंतिम चरण में पहुँची थी। उस दिन संविधान सभा (Constituent Assembly) की अंतिम बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें सभी 284 सदस्यों ने संविधान की दो मूल प्रतियों पर हस्ताक्षर (Signatures) किए थे। ये प्रतियाँ हिंदी और अंग्रेजी (English) भाषाओं में हाथ से लिखी गई थीं। सदस्यों के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह दस्तावेज भारत के भविष्य का कानूनी आधार (Legal Foundation) बन गया।

हस्ताक्षर करने वाली हस्तियों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान नेता शामिल थे। दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन इन प्रतियों पर हस्ताक्षर हो रहे थे, उस दिन बाहर तेज बारिश (Rain) हो रही थी। उस समय मौजूद सदस्यों ने इसे एक शुभ संकेत (Good Omen) माना था। यह हस्ताक्षर समारोह संसद भवन (Parliament House) के केंद्रीय कक्ष में आयोजित किया गया था, जो आज भी भारतीय लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है।

संविधान की ये मूल प्रतियाँ टाइप या प्रिंट नहीं की गई थीं, बल्कि इन्हें प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने 'इटैलिक शैली' (Italic Style) में बहुत खूबसूरती से लिखा था। इसके हर पन्ने को शांतिनिकेतन के कलाकारों द्वारा सजाया गया था, जो भारत की कलात्मक विरासत (Artistic Heritage) को दर्शाता है। इन प्रतियों पर हस्ताक्षर करना केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह भारत के करोड़ों लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की शपथ (Oath) लेने जैसा था।

इसी बैठक के दौरान 'जन गण मन' को आधिकारिक रूप से भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) स्वीकार किया गया। इसके साथ ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सर्वसम्मति से भारत का प्रथम राष्ट्रपति (First President) चुना गया। संविधान सभा ने स्वयं को भंग कर दिया और वह 26 जनवरी से अंतरिम संसद (Interim Parliament) के रूप में कार्य करने लगी। यह संक्रमण काल भारत के प्रशासनिक ढांचे (Administrative Framework) को मजबूती देने के लिए अत्यंत आवश्यक था।

आज भी संविधान की वे मूल प्रतियाँ संसद भवन के पुस्तकालय (Library) में हीलियम गैस से भरे विशेष बक्सों (Cases) में सुरक्षित रखी गई हैं। इन पर किए गए प्रत्येक हस्ताक्षर उन संघर्षों और सपनों की गवाही देते हैं जो स्वतंत्र भारत के लिए देखे गए थे। यह प्रक्रिया हमें सिखाती है कि संवाद और सहमति (Consensus) ही एक सफल लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। संविधान सभा की वह अंतिम बैठक भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

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भारतीय संविधान (Indian Constitution) के निर्माण की प्रक्रिया 24 जनवरी 1950 को अपने अंतिम चरण में पहुँची थी। उस दिन संविधान सभा (Constituent Assembly) की अंतिम बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें सभी 284 सदस्यों ने संविधान की दो मूल प्रतियों पर हस्ताक्षर (Signatures) किए थे। ये प्रतियाँ हिंदी और अंग्रेजी (English) भाषाओं में हाथ से लिखी गई थीं। सदस्यों के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह दस्तावेज भारत के भविष्य का कानूनी आधार (Legal Foundation) बन गया।

हस्ताक्षर करने वाली हस्तियों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान नेता शामिल थे। दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन इन प्रतियों पर हस्ताक्षर हो रहे थे, उस दिन बाहर तेज बारिश (Rain) हो रही थी। उस समय मौजूद सदस्यों ने इसे एक शुभ संकेत (Good Omen) माना था। यह हस्ताक्षर समारोह संसद भवन (Parliament House) के केंद्रीय कक्ष में आयोजित किया गया था, जो आज भी भारतीय लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है।

संविधान की ये मूल प्रतियाँ टाइप या प्रिंट नहीं की गई थीं, बल्कि इन्हें प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने 'इटैलिक शैली' (Italic Style) में बहुत खूबसूरती से लिखा था। इसके हर पन्ने को शांतिनिकेतन के कलाकारों द्वारा सजाया गया था, जो भारत की कलात्मक विरासत (Artistic Heritage) को दर्शाता है। इन प्रतियों पर हस्ताक्षर करना केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह भारत के करोड़ों लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की शपथ (Oath) लेने जैसा था।

इसी बैठक के दौरान 'जन गण मन' को आधिकारिक रूप से भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) स्वीकार किया गया। इसके साथ ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सर्वसम्मति से भारत का प्रथम राष्ट्रपति (First President) चुना गया। संविधान सभा ने स्वयं को भंग कर दिया और वह 26 जनवरी से अंतरिम संसद (Interim Parliament) के रूप में कार्य करने लगी। यह संक्रमण काल भारत के प्रशासनिक ढांचे (Administrative Framework) को मजबूती देने के लिए अत्यंत आवश्यक था।

आज भी संविधान की वे मूल प्रतियाँ संसद भवन के पुस्तकालय (Library) में हीलियम गैस से भरे विशेष बक्सों (Cases) में सुरक्षित रखी गई हैं। इन पर किए गए प्रत्येक हस्ताक्षर उन संघर्षों और सपनों की गवाही देते हैं जो स्वतंत्र भारत के लिए देखे गए थे। यह प्रक्रिया हमें सिखाती है कि संवाद और सहमति (Consensus) ही एक सफल लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। संविधान सभा की वह अंतिम बैठक भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
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