शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) या लैलतुल-क़द्र की रात में की जाने वाली दुआओं (Supplications) में सबसे प्रमुख वह दुआ है जो पैगंबर साहब ने अपनी पत्नी हज़रत आयशा को सिखाई थी। वह दुआ है: "अल्लाहुम्मा इन्नका अफुव्वुन तुहिब्बल अफवा फअफु अन्नी" (Ae Allah, Tu Maaf Karne Wala Hai Aur Maafi Ko Pasand Karta Hai, Isliye Mujhe Maaf Kar De)। यह दुआ अल्लाह से क्षमा (Forgiveness) मांगने का सबसे सरल और शक्तिशाली माध्यम है।
इस मुक़द्दस रात में नमाज़-ए-तहाजुद (Night Prayer) और सलातुल-तस्बीह पढ़ने का बहुत बड़ा महत्व है। लोग नफ़िल नमाज़ों (Extra Prayers) के साथ-साथ क़ुरआन की तिलावत (Recitation of Quran) में अपना समय बिताते हैं। दुआओं में केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी उम्मत (Muslim Community) और मानवता के लिए शांति और सुरक्षा की भीख मांगी जाती है। सज़दे (Prostrations) में गिरकर अल्लाह के सामने अपने गुनाहों का इकरार करना इस रात की रूह है।
इबादत (Worship) के दौरान ज़िक्र और अज़्कार (Remembrance of Allah) जैसे तस्बीह और दुरूद शरीफ़ पढ़ना दिल को सुकून पहुँचाता है। बहुत से लोग इस रात को जागने के लिए सामूहिक दुआओं (Congregational Prayers) का हिस्सा बनते हैं। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) में मांगी गई दुआओं के बारे में विश्वास है कि वे कभी खाली नहीं जातीं। अल्लाह इस रात अपने बंदों के लिए रिज़्क़ (Provision) और सेहत के फैसले करता है।
इबादत का तरीका (Method of Worship) यह होना चाहिए कि इंसान पूरी एकाग्रता के साथ अल्लाह की ओर मुतवज्जे हो। दुनियावी बातों और मोबाइल फोन (Mobile Phones) से दूरी बनाकर केवल आख़िरत (Hereafter) की चिंता करना ही असली इबादत है। आंसुओं के साथ की गई तौबा (Repentance) अल्लाह को बहुत पसंद है। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) की हर दुआ में सच्चाई और ईमानदारी (Sincerity) का होना लाज़मी है।
यह रात हमें आत्म-सुधार (Self-improvement) का मौका देती है। नमाज़ और दुआ के अलावा, दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार और दान-पुण्य करना भी इस रात की इबादत का हिस्सा है। शब-ए-क़द्र (Shab-i-Qadr) की दुआ हमें यह सिखाती है कि हम अल्लाह के कितने मोहताज हैं। इस रात का एक-एक पल बहुत कीमती है और इसे गफलत (Negligence) में नहीं गुज़ारना चाहिए। अल्लाह हम सबकी इबादतों को अपनी बारगाह में मंज़ूर फरमाए।