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रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखना (Fasting) एक महत्वपूर्ण इबादत है, जिसकी शुरुआत सुबह सहरी के समय एक विशेष दुआ या नीयत से होती है। सहरी (Pre-dawn meal) समाप्त करने के बाद "व बि सोमि गदिन नवैतु मिन शहरि रमज़ान" पढ़ना सुन्नत माना जाता है, जिसका अर्थ है कि मैं अल्लाह के लिए कल के रोज़े की नीयत (Intention) करता हूँ। नीयत वास्तव में दिल के पक्के इरादे का नाम है, इसलिए यदि कोई ज़ुबान से शब्द नहीं भी कहता लेकिन मन में रोज़े का संकल्प (Resolution) रखता है, तो उसका रोज़ा मान्य होता है। यह दुआ मोमिन को पूरे दिन भूखा-प्यासा रहने की रूहानी ताक़त (Spiritual Strength) प्रदान करती है।

सूर्यास्त के समय जब मग़रिब की अज़ान होती है, तब रोज़ा खोलने यानी इफ़्तार (Iftar) करने की दुआ पढ़ी जाती है। इफ़्तार की दुआ "अल्लाहुम्मा लका सुमतु व बिका आमन्तु व अला रिज़क़िका अफ़्तरतु" है, जिसका अर्थ है कि ऐ अल्लाह, मैंने तेरे ही लिए रोज़ा रखा और तेरे ही दिए हुए रिज़्क (Provision) से इसे खोल रहा हूँ। इफ़्तार के समय दुआ माँगना अत्यंत फलदायी होता है क्योंकि अल्लाह उस समय अपने बंदों की पुकार को कभी खाली नहीं जाने देता। यह दुआ (Supplication) इंसान के भीतर कृतज्ञता और विनय का भाव जागृत करती है।

दुआ और नीयत (Dua and Intention) की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह हमारे शारीरिक कार्यों को रूहानी इबादत (Spiritual Worship) में बदल देती है। बिना नीयत के भूखा रहना केवल एक उपवास हो सकता है, लेकिन अल्लाह की रज़ा के लिए पढ़ी गई दुआ इसे 'रोज़ा' (Roza) बनाती है। यह प्रक्रिया हमें याद दिलाती है कि हम जो भी त्याग कर रहे हैं, वह केवल उस परम सत्ता की प्रसन्नता के लिए है। दुआ के ये शब्द हमारे संकल्प को मज़बूती देते हैं और भटकने से बचाते हैं।

रोज़ा खोलने (Breaking the Fast) के समय ताज़ा खजूर या पानी का उपयोग करना पैगंबर साहब की सुन्नत है। इफ़्तार की दुआ पढ़ने के बाद जब पहला निवाला गले से उतरता है, तो वह क्षण बहुत ही सुकून भरा और बरकत (Blessing) वाला होता है। इस समय केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सलामती और शांति के लिए प्रार्थना (Prayer) करनी चाहिए। रमज़ान की ये दुआएँ हमारे और अल्लाह के बीच एक सीधा संपर्क स्थापित करती हैं, जिससे दिल को तसल्ली मिलती है।

नियमित रूप से दुआ (Dua) पढ़ने का अभ्यास बच्चों को भी सिखाना चाहिए ताकि वे बचपन से ही इन रूहानी मूल्यों (Spiritual Values) को समझ सकें। रमज़ान का महीना दुआओं की स्वीकार्यता का महीना है, इसलिए हर रोज़ेदार को इन शब्दों की गहराई और अर्थ को समझकर इन्हें पढ़ना चाहिए। दुआ के साथ किया गया हर अमल अल्लाह की बारगाह में ऊँचा मुकाम पाता है। यह हमारे ईमान (Faith) को ताज़गी देता है और पूरे महीने हमें इबादत के उत्साह से सराबोर रखता है।

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रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखना (Fasting) एक महत्वपूर्ण इबादत है, जिसकी शुरुआत सुबह सहरी के समय एक विशेष दुआ या नीयत से होती है। सहरी (Pre-dawn meal) समाप्त करने के बाद "व बि सोमि गदिन नवैतु मिन शहरि रमज़ान" पढ़ना सुन्नत माना जाता है, जिसका अर्थ है कि मैं अल्लाह के लिए कल के रोज़े की नीयत (Intention) करता हूँ। नीयत वास्तव में दिल के पक्के इरादे का नाम है, इसलिए यदि कोई ज़ुबान से शब्द नहीं भी कहता लेकिन मन में रोज़े का संकल्प (Resolution) रखता है, तो उसका रोज़ा मान्य होता है। यह दुआ मोमिन को पूरे दिन भूखा-प्यासा रहने की रूहानी ताक़त (Spiritual Strength) प्रदान करती है।

सूर्यास्त के समय जब मग़रिब की अज़ान होती है, तब रोज़ा खोलने यानी इफ़्तार (Iftar) करने की दुआ पढ़ी जाती है। इफ़्तार की दुआ "अल्लाहुम्मा लका सुमतु व बिका आमन्तु व अला रिज़क़िका अफ़्तरतु" है, जिसका अर्थ है कि ऐ अल्लाह, मैंने तेरे ही लिए रोज़ा रखा और तेरे ही दिए हुए रिज़्क (Provision) से इसे खोल रहा हूँ। इफ़्तार के समय दुआ माँगना अत्यंत फलदायी होता है क्योंकि अल्लाह उस समय अपने बंदों की पुकार को कभी खाली नहीं जाने देता। यह दुआ (Supplication) इंसान के भीतर कृतज्ञता और विनय का भाव जागृत करती है।

दुआ और नीयत (Dua and Intention) की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह हमारे शारीरिक कार्यों को रूहानी इबादत (Spiritual Worship) में बदल देती है। बिना नीयत के भूखा रहना केवल एक उपवास हो सकता है, लेकिन अल्लाह की रज़ा के लिए पढ़ी गई दुआ इसे 'रोज़ा' (Roza) बनाती है। यह प्रक्रिया हमें याद दिलाती है कि हम जो भी त्याग कर रहे हैं, वह केवल उस परम सत्ता की प्रसन्नता के लिए है। दुआ के ये शब्द हमारे संकल्प को मज़बूती देते हैं और भटकने से बचाते हैं।

रोज़ा खोलने (Breaking the Fast) के समय ताज़ा खजूर या पानी का उपयोग करना पैगंबर साहब की सुन्नत है। इफ़्तार की दुआ पढ़ने के बाद जब पहला निवाला गले से उतरता है, तो वह क्षण बहुत ही सुकून भरा और बरकत (Blessing) वाला होता है। इस समय केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सलामती और शांति के लिए प्रार्थना (Prayer) करनी चाहिए। रमज़ान की ये दुआएँ हमारे और अल्लाह के बीच एक सीधा संपर्क स्थापित करती हैं, जिससे दिल को तसल्ली मिलती है।

नियमित रूप से दुआ (Dua) पढ़ने का अभ्यास बच्चों को भी सिखाना चाहिए ताकि वे बचपन से ही इन रूहानी मूल्यों (Spiritual Values) को समझ सकें। रमज़ान का महीना दुआओं की स्वीकार्यता का महीना है, इसलिए हर रोज़ेदार को इन शब्दों की गहराई और अर्थ को समझकर इन्हें पढ़ना चाहिए। दुआ के साथ किया गया हर अमल अल्लाह की बारगाह में ऊँचा मुकाम पाता है। यह हमारे ईमान (Faith) को ताज़गी देता है और पूरे महीने हमें इबादत के उत्साह से सराबोर रखता है।
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