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बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt), जिन्हें बी.के. दत्त के नाम से भी जाना जाता है, भगत सिंह के सबसे भरोसेमंद साथी और क्रांतिकारी (Revolutionary) थे। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली (Central Assembly) में बम फेंकने के साहसी कार्य में वे भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि सोई हुई ब्रिटिश सरकार (British Government) को भारतीय जनता की आवाज़ सुनाना था। बम फेंकने के बाद उन्होंने भागने के बजाय स्वेच्छा से गिरफ्तारी (Arrest) दी।

उनका जन्म बंगाल के बर्धमान जिले में हुआ था, लेकिन उनकी क्रांतिकारी गतिविधियां (Revolutionary Activities) कानपुर और उत्तर भारत में सक्रिय रहीं। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में उन्होंने बम बनाने और रणनीतियां तैयार करने में विशेषज्ञता हासिल की थी। विधानसभा (Assembly) में उन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। उनके इस बलिदान और निडरता (Fearlessness) ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर कर दिया।

बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt) को इस मामले में आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई गई और उन्हें कालापानी (Cellular Jail) भेज दिया गया। जेल के भीतर उन्होंने कैदियों के अधिकारों के लिए भगत सिंह के साथ ऐतिहासिक भूख हड़ताल (Hunger Strike) की। उनके स्वास्थ्य पर जेल की प्रताड़नाओं (Torts) का बुरा असर पड़ा, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति कभी कमजोर नहीं हुई। आज़ादी के बाद उनका जीवन बहुत कठिनाइयों में बीता, जो एक दुखद सच्चाई (Sad Reality) है।

स्वतंत्र भारत (Independent India) में उन्हें वह सम्मान और आर्थिक सहायता नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। उन्होंने अपनी जीविका चलाने के लिए छोटे-मोटे काम किए, लेकिन कभी अपने स्वाभिमान (Self-respect) से समझौता नहीं किया। उनके जीवन का उत्तरार्ध गंभीर बीमारी (Illness) और उपेक्षा में बीता। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के कई नायक गुमनामी के अंधेरे में भी रहे। शहीद दिवस पर बटुकेश्वर दत्त को याद करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी (Moral Responsibility) है।

1965 में उनका निधन हो गया और उनकी अंतिम इच्छा (Last Wish) के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भी भगत सिंह की समाधि के पास हुसैनीवाला में किया गया। उनकी यह अटूट मित्रता (Friendship) और देश के प्रति समर्पण बेमिसाल है। वे एक सच्चे राष्ट्रभक्त (Patriot) थे जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल की काल कोठरियों में बिता दी। बटुकेश्वर दत्त का योगदान हमें सिखाता है कि आज़ादी की कीमत बहुत भारी होती है और हमें इसे सहेज कर रखना चाहिए।

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बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt), जिन्हें बी.के. दत्त के नाम से भी जाना जाता है, भगत सिंह के सबसे भरोसेमंद साथी और क्रांतिकारी (Revolutionary) थे। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली (Central Assembly) में बम फेंकने के साहसी कार्य में वे भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि सोई हुई ब्रिटिश सरकार (British Government) को भारतीय जनता की आवाज़ सुनाना था। बम फेंकने के बाद उन्होंने भागने के बजाय स्वेच्छा से गिरफ्तारी (Arrest) दी।

उनका जन्म बंगाल के बर्धमान जिले में हुआ था, लेकिन उनकी क्रांतिकारी गतिविधियां (Revolutionary Activities) कानपुर और उत्तर भारत में सक्रिय रहीं। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में उन्होंने बम बनाने और रणनीतियां तैयार करने में विशेषज्ञता हासिल की थी। विधानसभा (Assembly) में उन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। उनके इस बलिदान और निडरता (Fearlessness) ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर कर दिया।

बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt) को इस मामले में आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई गई और उन्हें कालापानी (Cellular Jail) भेज दिया गया। जेल के भीतर उन्होंने कैदियों के अधिकारों के लिए भगत सिंह के साथ ऐतिहासिक भूख हड़ताल (Hunger Strike) की। उनके स्वास्थ्य पर जेल की प्रताड़नाओं (Torts) का बुरा असर पड़ा, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति कभी कमजोर नहीं हुई। आज़ादी के बाद उनका जीवन बहुत कठिनाइयों में बीता, जो एक दुखद सच्चाई (Sad Reality) है।

स्वतंत्र भारत (Independent India) में उन्हें वह सम्मान और आर्थिक सहायता नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। उन्होंने अपनी जीविका चलाने के लिए छोटे-मोटे काम किए, लेकिन कभी अपने स्वाभिमान (Self-respect) से समझौता नहीं किया। उनके जीवन का उत्तरार्ध गंभीर बीमारी (Illness) और उपेक्षा में बीता। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता संग्राम के कई नायक गुमनामी के अंधेरे में भी रहे। शहीद दिवस पर बटुकेश्वर दत्त को याद करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी (Moral Responsibility) है।

1965 में उनका निधन हो गया और उनकी अंतिम इच्छा (Last Wish) के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भी भगत सिंह की समाधि के पास हुसैनीवाला में किया गया। उनकी यह अटूट मित्रता (Friendship) और देश के प्रति समर्पण बेमिसाल है। वे एक सच्चे राष्ट्रभक्त (Patriot) थे जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल की काल कोठरियों में बिता दी। बटुकेश्वर दत्त का योगदान हमें सिखाता है कि आज़ादी की कीमत बहुत भारी होती है और हमें इसे सहेज कर रखना चाहिए।
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