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केवल ज्ञान (Keval Gyan) जैन दर्शन की सर्वोच्च अवस्था है, जिसे पूर्ण ज्ञान या सर्वज्ञता (Omniscience) कहा जाता है। जब आत्मा पर चढ़े हुए समस्त कर्मों के आवरण (Covering of Karma) पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं, तब केवल ज्ञान का उदय होता है। इस अवस्था में साधक को ब्रह्मांड के हर जीव, वस्तु, भूत, भविष्य और वर्तमान का प्रत्यक्ष बोध (Direct Perception) हो जाता है। भगवान महावीर ने बारह वर्षों की कठिन साधना के बाद इस परम पद को प्राप्त किया था, जिसके बाद वे 'केवलिन' (Kevalid) कहलाए।

केवल ज्ञान प्राप्ति (Keval Gyan Prapti) के लिए साधक को घनघाती कर्मों, विशेषकर ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मों का क्षय करना पड़ता है। यह अवस्था बिना किसी बाहरी माध्यम या इंद्रियों (Senses) की सहायता के प्राप्त होती है। जब मन पूरी तरह से स्थिर और निर्विकार (Stabillized and Pure) हो जाता है, तब आत्मा की अपनी स्वाभाविक प्रकाशमयी शक्ति प्रकट होती है। यह ज्ञान अनंत और अविनाशी (Infinite and Indestructible) है। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद संसार की कोई भी वस्तु छिपी नहीं रह जाती।

भगवान महावीर ने ऋजुपालिका नदी के तट पर 'शाल वृक्ष' (Sal Tree) के नीचे गोदोहन आसन में ध्यान लगाते हुए इस ज्ञान को प्राप्त किया था। उस समय उन्होंने चार घातिया कर्मों (Ghatiya Karma) का विनाश कर दिया था। केवल ज्ञान प्राप्ति (Keval Gyan Prapti) की यह घटना ब्रह्मांड के इतिहास में एक महान आध्यात्मिक क्रांति (Spiritual Revolution) के समान थी। उस क्षण संपूर्ण प्रकृति शांत और आनंदमयी हो गई थी। केवलिन बनने के बाद, प्रभु ने दिव्य ध्वनि के माध्यम से धर्म का उपदेश देना प्रारंभ किया।

इस ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र (Right Faith, Knowledge, and Conduct) के अभ्यास से होकर गुजरता है। केवल ज्ञान (Keval Gyan) का अर्थ है कि अब आत्मा को कुछ भी जानना शेष नहीं है। यह अवस्था पूर्ण वीतरागता (Non-attachment) की होती है, जहाँ राग और द्वेष का पूरी तरह लोप हो जाता है। केवल ज्ञानी महापुरुष संपूर्ण जगत के जीवों के कल्याण के लिए मार्गदर्शक (Guide) बन जाते हैं। यह जैन तत्व ज्ञान (Jain Tatva Gyan) का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम लक्ष्य माना गया है।

केवल ज्ञान (Keval Gyan) प्राप्त होने पर आत्मा अपने मूल गुणों को पुनः प्राप्त कर लेती है। यह वह अवस्था है जहाँ जन्म और मरण के चक्र (Cycle of Birth and Death) के कारणों का नाश हो जाता है। यद्यपि शरीर शेष रहता है, लेकिन आत्मा मुक्त हो चुकी होती है। महावीर स्वामी ने इस ज्ञान के माध्यम से 'जियो और जीने दो' (Live and Let Live) का सार्वभौमिक संदेश दिया। केवल ज्ञान की प्राप्ति हमें यह विश्वास दिलाती है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता (Potential) विद्यमान है।

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केवल ज्ञान (Keval Gyan) जैन दर्शन की सर्वोच्च अवस्था है, जिसे पूर्ण ज्ञान या सर्वज्ञता (Omniscience) कहा जाता है। जब आत्मा पर चढ़े हुए समस्त कर्मों के आवरण (Covering of Karma) पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं, तब केवल ज्ञान का उदय होता है। इस अवस्था में साधक को ब्रह्मांड के हर जीव, वस्तु, भूत, भविष्य और वर्तमान का प्रत्यक्ष बोध (Direct Perception) हो जाता है। भगवान महावीर ने बारह वर्षों की कठिन साधना के बाद इस परम पद को प्राप्त किया था, जिसके बाद वे 'केवलिन' (Kevalid) कहलाए।

केवल ज्ञान प्राप्ति (Keval Gyan Prapti) के लिए साधक को घनघाती कर्मों, विशेषकर ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मों का क्षय करना पड़ता है। यह अवस्था बिना किसी बाहरी माध्यम या इंद्रियों (Senses) की सहायता के प्राप्त होती है। जब मन पूरी तरह से स्थिर और निर्विकार (Stabillized and Pure) हो जाता है, तब आत्मा की अपनी स्वाभाविक प्रकाशमयी शक्ति प्रकट होती है। यह ज्ञान अनंत और अविनाशी (Infinite and Indestructible) है। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद संसार की कोई भी वस्तु छिपी नहीं रह जाती।

भगवान महावीर ने ऋजुपालिका नदी के तट पर 'शाल वृक्ष' (Sal Tree) के नीचे गोदोहन आसन में ध्यान लगाते हुए इस ज्ञान को प्राप्त किया था। उस समय उन्होंने चार घातिया कर्मों (Ghatiya Karma) का विनाश कर दिया था। केवल ज्ञान प्राप्ति (Keval Gyan Prapti) की यह घटना ब्रह्मांड के इतिहास में एक महान आध्यात्मिक क्रांति (Spiritual Revolution) के समान थी। उस क्षण संपूर्ण प्रकृति शांत और आनंदमयी हो गई थी। केवलिन बनने के बाद, प्रभु ने दिव्य ध्वनि के माध्यम से धर्म का उपदेश देना प्रारंभ किया।

इस ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र (Right Faith, Knowledge, and Conduct) के अभ्यास से होकर गुजरता है। केवल ज्ञान (Keval Gyan) का अर्थ है कि अब आत्मा को कुछ भी जानना शेष नहीं है। यह अवस्था पूर्ण वीतरागता (Non-attachment) की होती है, जहाँ राग और द्वेष का पूरी तरह लोप हो जाता है। केवल ज्ञानी महापुरुष संपूर्ण जगत के जीवों के कल्याण के लिए मार्गदर्शक (Guide) बन जाते हैं। यह जैन तत्व ज्ञान (Jain Tatva Gyan) का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम लक्ष्य माना गया है।

केवल ज्ञान (Keval Gyan) प्राप्त होने पर आत्मा अपने मूल गुणों को पुनः प्राप्त कर लेती है। यह वह अवस्था है जहाँ जन्म और मरण के चक्र (Cycle of Birth and Death) के कारणों का नाश हो जाता है। यद्यपि शरीर शेष रहता है, लेकिन आत्मा मुक्त हो चुकी होती है। महावीर स्वामी ने इस ज्ञान के माध्यम से 'जियो और जीने दो' (Live and Let Live) का सार्वभौमिक संदेश दिया। केवल ज्ञान की प्राप्ति हमें यह विश्वास दिलाती है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता (Potential) विद्यमान है।
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