रमज़ान के पाक महीने में दुआ (Supplication) की अहमियत बहुत ज़्यादा है क्योंकि यह बंदे और खुदा के बीच सीधा संवाद (Communication) है। सहरी के वक्त जब हम रोज़ा रखने की नीयत (Intention) करते हैं, तो दिल से यह इकरार करना ज़रूरी है कि हम सिर्फ अल्लाह की रज़ा (Pleasure of Allah) के लिए भूखे-प्यासे रह रहे हैं। दुआ के शब्द (Words of Prayer) रूहानी तौर पर इंसान को दिन भर के सब्र (Patience) के लिए तैयार करते हैं। यह वक्त तहज्जुद का भी होता है, इसलिए की गई हर तौबा और इल्तिजा (Request) खुदा के दरबार में मंज़ूर होने की पूरी उम्मीद होती है।
इफ्तार का वक्त (Iftar Time) तो दुआओं की कबूलियत का सबसे खास लम्हा माना जाता है। नबी करीम ने फरमाया है कि रोज़ेदार की इफ्तार (Roza Iftar) के समय की गई दुआ कभी खाली नहीं जाती। उस वक्त यह कहना कि "ऐ अल्लाह, मैंने तेरे ही लिए रोज़ा रखा और तेरे ही दिए रिज़्क (Provision) से इफ्तार किया," इंसान की आज़िज़ी और शुक्रगुज़ारी (Gratitude) को दर्शाता है। दुआ (Ramzan Dua) केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी उम्मत और मानवता की सलामती (Safety of Humanity) के लिए करनी चाहिए।
रमज़ान के तीन अशरों (Three Ashras) के लिए अलग-अलग दुआएं (Specific Prayers) मुकर्रर हैं जो रहमत, मगफिरत और जहन्नम से निज़ात (Freedom from Hell) की माँग पर आधारित हैं। पहले दस दिनों में अल्लाह की रहमत (Mercy) की तलब की जाती है, जो इंसान के रूहानी सफर की शुरुआत है। इसके बाद के दिनों में अपने गुनाहों की माफ़ी (Forgiveness of Sins) माँगना रूह को पाकीज़ा (Pure) बनाता है। दुआ (Dua) केवल जुबान से नहीं बल्कि पूरे यक़ीन (Certainty) के साथ दिल की गहराई से होनी चाहिए।
कुरान की आयतों (Quranic Verses) और मसनून दुआओं का ज़िक्र (Remembrance) पूरे महीने घर के माहौल को नूरानी (Radiant) बनाए रखता है। बहुत से लोग इस दौरान कसरत से इस्तिगफार (Seeking Repentance) पढ़ते हैं ताकि रूहानी तौर पर खुद को बेहतर बना सकें। रमज़ान की दुआ (Ramzan Dua) इंसान को तक़वा (Piety) यानी परहेजगारी के रास्ते पर ले जाती है। यह इबादत (Worship) का वह मर्तबा है जहाँ बंदा अपने खालिक के सबसे करीब महसूस करता है।
रमज़ान की रातों में, खास तौर पर शब-ए-कद्र (Night of Power) में, अल्लाह से आफियत और दरगुज़र (Forgiveness and Well-being) की माँग करना सबसे उत्तम है। दुआ (Ramzan Dua) हमारे मुकद्दर को बदलने की ताकत रखती है और दिल के ज़ख्मों को चंगा करती है। इबादत (Worship) के ये पल इंसान को दुनियावी मोह-माया से हटाकर आखिरत (Hereafter) की तैयारी की ओर ले जाते हैं। हर दुआ एक नई उम्मीद और रूहानी सुकून (Spiritual Contentment) लेकर आती है।