बुद्ध धम्म (Buddha Dhamma) एक वैज्ञानिक जीवन पद्धति है जो अंधविश्वास के स्थान पर तर्क (Reason) और अनुभव पर आधारित है। इसका मूल आधार शील (Morality), समाधि (Concentration) और प्रज्ञा (Wisdom) है। बुद्ध ने कभी भी अपने वचनों को बिना परखे मानने के लिए नहीं कहा, बल्कि उन्होंने "एहि पस्सिका" (Ehi Passika) का संदेश दिया, जिसका अर्थ है "आओ और स्वयं देखो"। यह धर्म किसी अदृश्य ईश्वर के बजाय स्वयं के कर्मों (Karma) पर जोर देता है।
धम्म (Dhamma) का एक प्रमुख सिद्धांत अनीश्वरवाद और अनित्यता (Impermanence) है। बुद्ध के अनुसार संसार में कुछ भी स्थायी (Permanent) नहीं है, सब कुछ निरंतर बदल रहा है। इस सत्य को स्वीकार करने से व्यक्ति मोह और आसक्ति (Attachment) से मुक्त हो जाता है। धम्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक आचरण (Ethical Conduct) है जिसे दैनिक जीवन में उतारना आवश्यक है। अहिंसा (Non-violence) इसका केंद्र बिंदु है।
समानता (Equality) बुद्ध धम्म की एक और विशेषता है, जहाँ जाति, वर्ण या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता। बुद्ध ने संघ (Sangha) की स्थापना की जहाँ राजा और रंक दोनों को समान सम्मान प्राप्त था। उन्होंने उस समय की कुरीतियों और बलि प्रथा (Sacrifice System) का कड़ा विरोध किया। यह धर्म मनुष्य को अपनी नियति का स्वयं निर्माता मानता है, जिसमें प्रार्थना से अधिक ध्यान (Meditation) का महत्व है।
धम्मपद (Dhammapada) जैसे ग्रंथों में बुद्ध ने जीवन जीने की कला सिखाई है, जो आज के तनावपूर्ण युग में भी प्रासंगिक है। इसमें दस पारमिताओं (Ten Paramitas) का उल्लेख है जो व्यक्ति को दान, धैर्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। बुद्ध धम्म (Buddha Dhamma) व्यक्ति को मानसिक गुलामी से मुक्त कर स्वतंत्र चिंतन (Independent Thinking) की ओर ले जाता है। यह एक व्यवहारिक दर्शन (Practical Philosophy) है।
विदेशी विद्वानों ने भी बुद्ध धम्म को एक "मनोविज्ञान" (Psychology) के रूप में देखा है क्योंकि यह मन के विकारों का उपचार करता है। इसमें करुणा (Compassion) और मैत्री (Loving-kindness) की भावना सर्वोपरि है। धम्म का मार्ग मध्यम मार्ग (Middle Path) है जो न तो भोग-विलास की अनुमति देता है और न ही कठोर वैराग्य की। यह संतुलन (Balance) ही शांतिपूर्ण जीवन का आधार है।