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बकरीद के मौके पर दी जाने वाली पशु कुर्बानी (Animal Sacrifice Eid) का मकसद अल्लाह के प्रति अपनी अटूट वफादारी (Loyalty) साबित करना है। इस्लामी शरीयत (Islamic Sharia) के मुताबिक, कुर्बानी के लिए चुना गया जानवर पूरी तरह तंदुरुस्त (Healthy) होना चाहिए। नियम यह है कि जानवर को कोई बड़ी शारीरिक बीमारी (Physical Illness) न हो और उसके अंग जैसे कान, सींग या पूंछ कटे हुए न हों। एक स्वस्थ जानवर का चुनाव इस बात का संकेत है कि हम ईश्वर की राह में सबसे बेहतरीन वस्तु (Best Offering) पेश कर रहे हैं।

जानवर की उम्र (Age of Animal) का भी कुर्बानी में खास ख्याल रखा जाता है। जैसे बकरे (Goat) की उम्र कम से कम एक साल पूरी होनी चाहिए और बड़े जानवर जैसे भैंस (Buffalo) की उम्र दो साल से कम नहीं होनी चाहिए। यह पाबंदी इसलिए है ताकि जानवर पूरी तरह विकसित (Fully Developed) हो चुका हो। कमजोर या बहुत ज्यादा बूढ़े जानवर की कुर्बानी मान्य नहीं मानी जाती। खरीदार को चाहिए कि वह जानवर के दांतों और उसकी चाल-ढाल की अच्छी तरह जांच (Inspection) कर ले।

कुर्बानी (Animal Sacrifice) की प्रक्रिया में दयालुता (Compassion) का भाव सबसे ऊपर रखा गया है। जानवर को जिबह (Slaughter) करने वाली छुरी बहुत तेज होनी चाहिए ताकि उसे कम से कम तकलीफ (Minimum Pain) हो। यह सख्त हिदायत है कि एक जानवर के सामने दूसरे जानवर को जिबह न किया जाए और उसे प्यासा न रखा जाए। यह संवेदनशीलता (Sensitivity) हमें सिखाती है कि मजहब में बेजुबान जीवों के प्रति भी रहम और जिम्मेदारी (Responsibility and Mercy) का बड़ा मुकाम है।

पशु बलि (Animal Sacrifice) के बाद साफ-सफाई (Cleanliness) बनाए रखना एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility) है। इस्लाम में सफाई को 'आधा ईमान' (Half of Faith) कहा गया है, इसलिए खून और गंदगी को रास्तों पर नहीं छोड़ना चाहिए। अवशेषों को जमीन में गहरा दबाना (Burial of Waste) सबसे सही तरीका है ताकि बीमारियों का खतरा न रहे। पर्यावरण की सुरक्षा (Environmental Protection) और पड़ोसियों की सुविधा का ध्यान रखना भी इबादत का ही एक हिस्सा माना जाता है।

कुर्बानी के मांस (Meat Distribution) को बांटने का तरीका बहुत ही इंसानियत भरा है। पूरे मांस को बराबर हिस्सों में तकसीम (Divide) किया जाता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा उन गरीबों (Poor People) को दिया जाता है जो गोश्त खरीदने की हैसियत नहीं रखते। यह रस्म समाज में आर्थिक समानता (Economic Equality) और भाईचारे को बढ़ावा देती है। बकरीद (Bakrid) का यह त्यौहार हमें अपनी जरूरतों को कम करके दूसरों की मदद (Helping Others) करने की सच्ची सीख देता है।

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बकरीद के मौके पर दी जाने वाली पशु कुर्बानी (Animal Sacrifice Eid) का मकसद अल्लाह के प्रति अपनी अटूट वफादारी (Loyalty) साबित करना है। इस्लामी शरीयत (Islamic Sharia) के मुताबिक, कुर्बानी के लिए चुना गया जानवर पूरी तरह तंदुरुस्त (Healthy) होना चाहिए। नियम यह है कि जानवर को कोई बड़ी शारीरिक बीमारी (Physical Illness) न हो और उसके अंग जैसे कान, सींग या पूंछ कटे हुए न हों। एक स्वस्थ जानवर का चुनाव इस बात का संकेत है कि हम ईश्वर की राह में सबसे बेहतरीन वस्तु (Best Offering) पेश कर रहे हैं।

जानवर की उम्र (Age of Animal) का भी कुर्बानी में खास ख्याल रखा जाता है। जैसे बकरे (Goat) की उम्र कम से कम एक साल पूरी होनी चाहिए और बड़े जानवर जैसे भैंस (Buffalo) की उम्र दो साल से कम नहीं होनी चाहिए। यह पाबंदी इसलिए है ताकि जानवर पूरी तरह विकसित (Fully Developed) हो चुका हो। कमजोर या बहुत ज्यादा बूढ़े जानवर की कुर्बानी मान्य नहीं मानी जाती। खरीदार को चाहिए कि वह जानवर के दांतों और उसकी चाल-ढाल की अच्छी तरह जांच (Inspection) कर ले।

कुर्बानी (Animal Sacrifice) की प्रक्रिया में दयालुता (Compassion) का भाव सबसे ऊपर रखा गया है। जानवर को जिबह (Slaughter) करने वाली छुरी बहुत तेज होनी चाहिए ताकि उसे कम से कम तकलीफ (Minimum Pain) हो। यह सख्त हिदायत है कि एक जानवर के सामने दूसरे जानवर को जिबह न किया जाए और उसे प्यासा न रखा जाए। यह संवेदनशीलता (Sensitivity) हमें सिखाती है कि मजहब में बेजुबान जीवों के प्रति भी रहम और जिम्मेदारी (Responsibility and Mercy) का बड़ा मुकाम है।

पशु बलि (Animal Sacrifice) के बाद साफ-सफाई (Cleanliness) बनाए रखना एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility) है। इस्लाम में सफाई को 'आधा ईमान' (Half of Faith) कहा गया है, इसलिए खून और गंदगी को रास्तों पर नहीं छोड़ना चाहिए। अवशेषों को जमीन में गहरा दबाना (Burial of Waste) सबसे सही तरीका है ताकि बीमारियों का खतरा न रहे। पर्यावरण की सुरक्षा (Environmental Protection) और पड़ोसियों की सुविधा का ध्यान रखना भी इबादत का ही एक हिस्सा माना जाता है।

कुर्बानी के मांस (Meat Distribution) को बांटने का तरीका बहुत ही इंसानियत भरा है। पूरे मांस को बराबर हिस्सों में तकसीम (Divide) किया जाता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा उन गरीबों (Poor People) को दिया जाता है जो गोश्त खरीदने की हैसियत नहीं रखते। यह रस्म समाज में आर्थिक समानता (Economic Equality) और भाईचारे को बढ़ावा देती है। बकरीद (Bakrid) का यह त्यौहार हमें अपनी जरूरतों को कम करके दूसरों की मदद (Helping Others) करने की सच्ची सीख देता है।
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