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जगन्नाथ रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) का उत्सव मुख्य रूप से नौ दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत 'गुंडिचा मार्जन' (Gundicha Marjana) से होती है, जिसमें भक्त मंदिर की सफाई करते हैं। मुख्य यात्रा के दिन भगवान अपने रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुँचते हैं, जिसे भगवान की मौसी का घर माना जाता है। यहाँ वे सात दिनों तक निवास करते हैं। इस दौरान गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple) में विशेष पूजा और उत्सव का वातावरण रहता है, जिसे 'आड़प दर्शन' कहा जाता है।

यात्रा के पांचवें दिन 'हेरा पंचमी' (Hera Panchami) मनाई जाती है। मान्यता है कि माता लक्ष्मी, भगवान जगन्नाथ के वापस न लौटने पर क्रोधित होकर उन्हें खोजने आती हैं। वे भगवान के रथ का एक हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से तोड़ देती हैं और वापस लौट जाती हैं। यह रस्म मानवीय भावनाओं (Human Emotions) और ईश्वरीय लीलाओं का एक सुंदर मेल है। भक्त इस दिन का बड़े उत्साह के साथ आनंद लेते हैं और विशेष रीति-रिवाजों (Rituals) का पालन करते हैं।

नौवें दिन भगवान की वापसी की यात्रा शुरू होती है, जिसे 'बहुड़ा यात्रा' (Bahuda Yatra) कहा जाता है। इस दिन भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वापसी के रास्ते में रथ 'मौसी माँ मंदिर' (Mausi Maa Temple) पर रुकते हैं, जहाँ भगवान को 'पोड़ा पीठा' (Poda Pitha) का भोग लगाया जाता है। यह एक प्रकार का मीठा केक (Sweet Cake) होता है जिसे भगवान का प्रिय माना जाता है। वापसी की यह यात्रा भी उतनी ही भव्य होती है जितनी मुख्य यात्रा।

मुख्य मंदिर पहुँचने पर भगवान रथों पर ही कुछ समय विश्राम करते हैं। इसके बाद 'सुना वेश' (Suna Besha) की रस्म होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को सोने के आभूषणों (Gold Ornaments) से सजाया जाता है। यह दृश्य अत्यंत आलौकिक और वैभवशाली होता है, जिसे देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इसके बाद 'अधर पणा' (Adhara Pana) की रस्म होती है, जिसमें रथों पर रखे गए मिट्टी के घड़ों में मीठा पेय अर्पित किया जाता है।

उत्सव का समापन 'नीलाद्रि बिजे' (Niladri Bije) के साथ होता है, जिसमें भगवान वापस मंदिर के गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) में प्रवेश करते हैं। इस दिन भगवान जगन्नाथ को अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मनाने के लिए 'रसगुल्ला' (Rasgulla) खिलाना पड़ता है, क्योंकि वे उन्हें यात्रा पर साथ न ले जाने से रुष्ट होती हैं। पुरी रथ यात्रा (Puri Rath Yatra) का यह नौ दिवसीय चक्र भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक धरोहर (Cultural Heritage) का एक पूर्ण पैकेज है जो हर वर्ष नई ऊर्जा के साथ मनाया जाता है।

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जगन्नाथ रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) का उत्सव मुख्य रूप से नौ दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत 'गुंडिचा मार्जन' (Gundicha Marjana) से होती है, जिसमें भक्त मंदिर की सफाई करते हैं। मुख्य यात्रा के दिन भगवान अपने रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुँचते हैं, जिसे भगवान की मौसी का घर माना जाता है। यहाँ वे सात दिनों तक निवास करते हैं। इस दौरान गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple) में विशेष पूजा और उत्सव का वातावरण रहता है, जिसे 'आड़प दर्शन' कहा जाता है।

यात्रा के पांचवें दिन 'हेरा पंचमी' (Hera Panchami) मनाई जाती है। मान्यता है कि माता लक्ष्मी, भगवान जगन्नाथ के वापस न लौटने पर क्रोधित होकर उन्हें खोजने आती हैं। वे भगवान के रथ का एक हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से तोड़ देती हैं और वापस लौट जाती हैं। यह रस्म मानवीय भावनाओं (Human Emotions) और ईश्वरीय लीलाओं का एक सुंदर मेल है। भक्त इस दिन का बड़े उत्साह के साथ आनंद लेते हैं और विशेष रीति-रिवाजों (Rituals) का पालन करते हैं।

नौवें दिन भगवान की वापसी की यात्रा शुरू होती है, जिसे 'बहुड़ा यात्रा' (Bahuda Yatra) कहा जाता है। इस दिन भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वापसी के रास्ते में रथ 'मौसी माँ मंदिर' (Mausi Maa Temple) पर रुकते हैं, जहाँ भगवान को 'पोड़ा पीठा' (Poda Pitha) का भोग लगाया जाता है। यह एक प्रकार का मीठा केक (Sweet Cake) होता है जिसे भगवान का प्रिय माना जाता है। वापसी की यह यात्रा भी उतनी ही भव्य होती है जितनी मुख्य यात्रा।

मुख्य मंदिर पहुँचने पर भगवान रथों पर ही कुछ समय विश्राम करते हैं। इसके बाद 'सुना वेश' (Suna Besha) की रस्म होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को सोने के आभूषणों (Gold Ornaments) से सजाया जाता है। यह दृश्य अत्यंत आलौकिक और वैभवशाली होता है, जिसे देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इसके बाद 'अधर पणा' (Adhara Pana) की रस्म होती है, जिसमें रथों पर रखे गए मिट्टी के घड़ों में मीठा पेय अर्पित किया जाता है।

उत्सव का समापन 'नीलाद्रि बिजे' (Niladri Bije) के साथ होता है, जिसमें भगवान वापस मंदिर के गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) में प्रवेश करते हैं। इस दिन भगवान जगन्नाथ को अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मनाने के लिए 'रसगुल्ला' (Rasgulla) खिलाना पड़ता है, क्योंकि वे उन्हें यात्रा पर साथ न ले जाने से रुष्ट होती हैं। पुरी रथ यात्रा (Puri Rath Yatra) का यह नौ दिवसीय चक्र भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक धरोहर (Cultural Heritage) का एक पूर्ण पैकेज है जो हर वर्ष नई ऊर्जा के साथ मनाया जाता है।
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