पुरी के मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुंडिचा मंदिर (Gundicha Mandir) को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। रथ यात्रा (Rath Yatra) का मुख्य उद्देश्य भगवान का अपने मुख्य निवास से इस मंदिर तक जाना है। पौराणिक कथाओं (Mythological Stories) के अनुसार, रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ की परम भक्त थीं और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वचन दिया था कि वे हर साल उनके घर आएंगे। इसीलिए इसे 'गुंडिचा घर' (Gundicha Ghar) भी कहा जाता है।
गुंडिचा मंदिर यात्रा (Gundicha Mandir Yatra) के दौरान भगवान यहाँ नौ दिनों तक रुकते हैं। यहाँ की मुख्य रस्मों में 'गुंडिचा मार्जन' (Cleaning of Temple) सबसे प्रमुख है, जो यात्रा से एक दिन पहले की जाती है। इसमें हजारों भक्त मिलकर मंदिर परिसर को पानी से साफ करते हैं, जो हृदय की शुद्धि (Purification of Heart) का प्रतीक है। भगवान के यहाँ ठहरने के दौरान उन्हें विशेष प्रकार के पकवान (Special Dishes) अर्पित किए जाते हैं जो उनके मौसी के घर के प्यार को दर्शाते हैं।
इस मंदिर को 'जनकपुर' (Janakpur) के नाम से भी जाना जाता है। नौ दिनों के इस प्रवास के दौरान पुरी का मुख्य मंदिर सूना हो जाता है और सारी रौनक गुंडिचा मंदिर (Gundicha Mandir) में स्थानांतरित हो जाती है। यहाँ 'आड़प दर्शन' (Adapa Darshana) का विशेष महत्व है, माना जाता है कि इस दौरान भगवान के दर्शन करने से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य (Virtue of Hundred Sacrifices) मिलता है। यह स्थान शांति और रूहानी सुकून (Spiritual Peace) का केंद्र बन जाता है।
गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple) में प्रवास के दौरान 'हेरा पंचमी' (Hera Panchami) की प्रसिद्ध रस्म होती है। इस दिन माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को वापस ले जाने के लिए यहाँ आती हैं। भगवान के वापस न आने पर वे क्रोधित होकर उनके रथ का एक हिस्सा तोड़ देती हैं। यह रस्म मानवीय रिश्तों (Human Relationships) और प्रेम की खट्टी-मीठी नोक-झोंक को प्रदर्शित करती है। यह मंदिर उस समय एक दिव्य लीला स्थली (Place of Divine Play) बन जाता है।
अंततः नौवें दिन भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर की ओर लौटते हैं, जिसे बहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) कहा जाता है। गुंडिचा मंदिर (Gundicha Mandir) की यह यात्रा भक्त और भगवान के बीच के प्रेम के वादे को निभाने का प्रतीक है। यहाँ की हर रस्म और परंपरा (Tradition and Custom) हमें सिखाती है कि ईश्वर अपने भक्तों के प्रेम के वश में हैं। गुंडिचा मंदिर की यह यात्रा भारतीय संस्कृति (Indian Culture) के आतिथ्य सत्कार और पारिवारिक जुड़ाव की गहराई को दर्शाती है।