मातृ दिवस के आधुनिक इतिहास (Modern History) की जड़ें अमेरिका से जुड़ी हुई हैं, जहाँ इसकी शुरुआत 'एना जार्विस' (Anna Jarvis) नामक महिला के प्रयासों से हुई थी। एना अपनी माँ से बहुत प्यार करती थीं और उनकी मृत्यु के बाद वे चाहती थीं कि दुनिया भर में माताओं को सम्मानित करने के लिए एक विशेष दिन निर्धारित (Scheduled) किया जाए। उन्होंने अपनी माँ की याद में एक स्मारक सभा (Memorial Service) आयोजित की और मातृ दिवस को आधिकारिक मान्यता (Official Recognition) दिलाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया।
सन 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन (Woodrow Wilson) ने आधिकारिक रूप से मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। हालांकि, प्राचीन काल (Ancient Times) में भी यूनान और रोम जैसी सभ्यताओं में मातृ देवियों की पूजा करने की परंपरा (Tradition) रही है। लेकिन एना जार्विस द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन (Movement) पूरी तरह से व्यक्तिगत माँ के प्रति प्रेम और सम्मान पर आधारित था, जिसने इसे एक वैश्विक पहचान (Global Identity) दिलाई।
ऐतिहासिक (Historical) रूप से देखा जाए तो इस दिन के पीछे का संदेश बहुत ही भावुक और प्रेरणादायक है। शुरुआती दौर में लोग चर्च जाकर या सफेद कार्नेशन (White Carnation) के फूल पहनकर अपनी माँ के प्रति प्रेम व्यक्त करते थे। धीरे-धीरे यह प्रथा (Practice) दुनिया के अन्य हिस्सों में भी फैल गई और हर देश ने अपनी संस्कृति (Culture) के अनुसार इसे अपना लिया। आज यह दिन दुनिया के सबसे बड़े और लोकप्रिय गैर-धार्मिक उत्सवों (Non-religious Festivals) में से एक बन चुका है।
एना जार्विस बाद में इस दिन के व्यवसायीकरण (Commercialization) के खिलाफ भी खड़ी हुई थीं, क्योंकि उनका मानना था कि यह दिन केवल शुद्ध भावनाओं (Pure Emotions) का होना चाहिए, न कि केवल उपहारों और व्यापार का। इतिहास हमें सिखाता है कि इस पर्व की मूल आत्मा (Soul) अपनी माँ के साथ समय बिताना और उनके प्रति अपनी सच्ची भावनाओं को प्रकट करना है। समय के साथ भले ही मनाने के तरीके बदल गए हों, लेकिन इसके पीछे का उद्देश्य (Objective) आज भी वही है।
भारत में भी पिछले कुछ दशकों में इस दिन को लेकर उत्साह काफी बढ़ा है, विशेषकर शहरी क्षेत्रों (Urban Areas) में। लोग अब इस इतिहास (History) को समझते हैं और इसे केवल एक विदेशी त्योहार न मानकर माँ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक मंच मानते हैं। इतिहास गवाह है कि माँ की ममता का सम्मान करना किसी भी सभ्य समाज (Civilized Society) की पहचान है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों को याद रखने और माँ के निस्वार्थ प्रेम (Unselfish Love) का कर्ज चुकाने की याद दिलाता रहता है।