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बॉन्ड की यील्ड (Yield), जिसे हिंदी में प्रतिफल कहा जा सकता है, वह दर (Rate) है जो एक निवेशक (Investor) को बॉन्ड में निवेश करने पर प्राप्त होती है। यील्ड, बॉन्ड की ब्याज दर (Coupon Rate) से अलग होती है। कूपन दर वह निश्चित दर है जो बॉन्ड जारी करते समय तय की जाती है और बॉन्ड के मूल्य (Face Value) पर आधारित होती है, जबकि यील्ड बॉन्ड के वर्तमान बाजार मूल्य (Current Market Price) पर निवेशक का वास्तविक प्रतिफल (Actual Return) दर्शाती है।

सबसे आम यील्ड माप (Yield Measure) है यील्ड टू मैच्योरिटी (Yield to Maturity - YTM)। YTM वह अनुमानित कुल प्रतिफल है जो एक निवेशक प्राप्त करेगा यदि वह बॉन्ड को परिपक्वता तिथि (Maturity Date) तक रखता है और सभी कूपन भुगतान (Coupon Payments) को उसी दर पर पुनर्निवेश (Reinvest) करता है। YTM बॉन्ड की आंतरिक प्रतिफल दर (Internal Rate of Return - IRR) होती है। YTM, बॉन्ड की सुरक्षा (Safety) और मूल्य (Price) के साथ-साथ बाजार की ब्याज दरों (Market Interest Rates) पर निर्भर करती है।

बॉन्ड की यील्ड बाजार में ब्याज दरों (Interest Rates) में बदलाव के साथ बदलती है। बॉन्ड का बाजार मूल्य और उसकी यील्ड के बीच एक विपरीत संबंध (Inverse Relationship) होता है। इसका मतलब है कि जब बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो मौजूदा बॉन्ड की कीमतें (Prices) गिर जाती हैं, जिससे उनकी यील्ड (प्रतिफल) बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि पुराने, कम ब्याज दर वाले बॉन्ड अब बाजार में नए, उच्च ब्याज दर वाले बॉन्ड के सामने कम आकर्षक होते हैं। इसलिए, निवेशक पुराने बॉन्ड को कम कीमत पर बेचते हैं।

इसके विपरीत, जब बाजार में ब्याज दरें गिरती हैं, तो मौजूदा बॉन्ड की कीमतें बढ़ जाती हैं, और उनकी यील्ड घट जाती है। यह इसलिए होता है क्योंकि पुराने, उच्च ब्याज दर वाले बॉन्ड अब अधिक मूल्यवान (More Valuable) हो जाते हैं। यील्ड में परिवर्तन (Change in Yield) भी जारीकर्ता (Issuer) की क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) में बदलाव के कारण हो सकता है। यदि कंपनी या सरकार की रेटिंग घटती है, तो जोखिम बढ़ने के कारण बॉन्ड की यील्ड बढ़ जाती है।

संक्षेप में, बॉन्ड की यील्ड (Yield) निवेशक का वास्तविक प्रतिफल (Actual Return) है, और यह बॉन्ड के मूल्य (Price) के साथ विपरीत दिशा (Inverse Direction) में चलती है। इसका निर्धारण मुख्य रूप से बाजार की ब्याज दरों (Interest Rates) और जारीकर्ता के जोखिम (Risk) से होता है।

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बॉन्ड की यील्ड (Yield), जिसे हिंदी में प्रतिफल कहा जा सकता है, वह दर (Rate) है जो एक निवेशक (Investor) को बॉन्ड में निवेश करने पर प्राप्त होती है। यील्ड, बॉन्ड की ब्याज दर (Coupon Rate) से अलग होती है। कूपन दर वह निश्चित दर है जो बॉन्ड जारी करते समय तय की जाती है और बॉन्ड के मूल्य (Face Value) पर आधारित होती है, जबकि यील्ड बॉन्ड के वर्तमान बाजार मूल्य (Current Market Price) पर निवेशक का वास्तविक प्रतिफल (Actual Return) दर्शाती है।

सबसे आम यील्ड माप (Yield Measure) है यील्ड टू मैच्योरिटी (Yield to Maturity - YTM)। YTM वह अनुमानित कुल प्रतिफल है जो एक निवेशक प्राप्त करेगा यदि वह बॉन्ड को परिपक्वता तिथि (Maturity Date) तक रखता है और सभी कूपन भुगतान (Coupon Payments) को उसी दर पर पुनर्निवेश (Reinvest) करता है। YTM बॉन्ड की आंतरिक प्रतिफल दर (Internal Rate of Return - IRR) होती है। YTM, बॉन्ड की सुरक्षा (Safety) और मूल्य (Price) के साथ-साथ बाजार की ब्याज दरों (Market Interest Rates) पर निर्भर करती है।

बॉन्ड की यील्ड बाजार में ब्याज दरों (Interest Rates) में बदलाव के साथ बदलती है। बॉन्ड का बाजार मूल्य और उसकी यील्ड के बीच एक विपरीत संबंध (Inverse Relationship) होता है। इसका मतलब है कि जब बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो मौजूदा बॉन्ड की कीमतें (Prices) गिर जाती हैं, जिससे उनकी यील्ड (प्रतिफल) बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि पुराने, कम ब्याज दर वाले बॉन्ड अब बाजार में नए, उच्च ब्याज दर वाले बॉन्ड के सामने कम आकर्षक होते हैं। इसलिए, निवेशक पुराने बॉन्ड को कम कीमत पर बेचते हैं।

इसके विपरीत, जब बाजार में ब्याज दरें गिरती हैं, तो मौजूदा बॉन्ड की कीमतें बढ़ जाती हैं, और उनकी यील्ड घट जाती है। यह इसलिए होता है क्योंकि पुराने, उच्च ब्याज दर वाले बॉन्ड अब अधिक मूल्यवान (More Valuable) हो जाते हैं। यील्ड में परिवर्तन (Change in Yield) भी जारीकर्ता (Issuer) की क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) में बदलाव के कारण हो सकता है। यदि कंपनी या सरकार की रेटिंग घटती है, तो जोखिम बढ़ने के कारण बॉन्ड की यील्ड बढ़ जाती है।

संक्षेप में, बॉन्ड की यील्ड (Yield) निवेशक का वास्तविक प्रतिफल (Actual Return) है, और यह बॉन्ड के मूल्य (Price) के साथ विपरीत दिशा (Inverse Direction) में चलती है। इसका निर्धारण मुख्य रूप से बाजार की ब्याज दरों (Interest Rates) और जारीकर्ता के जोखिम (Risk) से होता है।
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