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वर्तमान डिजिटल युग में Premanand Govind Sharan जी महाराज का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक और Insightful (सूझबूझ वाला) है। वे मानते हैं कि तकनीक और Social Media स्वयं में बुरे नहीं हैं, लेकिन उनका 'गलत उपयोग' मनुष्य की एकाग्रता और चरित्र को नष्ट कर रहा है। महाराज जी के अनुसार, युवा पीढ़ी आज रील और शॉर्ट वीडियो के जाल में फँसकर अपनी Creative Energy (रचनात्मक ऊर्जा) को बर्बाद कर रही है, जो वास्तव में चिंता का विषय है।

वे अक्सर अपने सत्संग में Digital Detox और 'स्वयं के साथ समय बिताने' पर जोर देते हैं। महाराज जी का कहना है कि जब तक हमारा मन बाहरी चकाचौंध में भटकता रहेगा, तब तक हम Inner Peace (आंतरिक शांति) की खोज नहीं कर पाएंगे। वे युवाओं को प्रेरित करते हैं कि वे इंटरनेट का उपयोग ज्ञान अर्जन और Positive Content (सकारात्मक सामग्री) के लिए करें, न कि केवल समय बिताने और वासनाओं को बढ़ाने के लिए।

महाराज जी की अपनी लोकप्रियता भी सोशल मीडिया के माध्यम से ही वैश्विक स्तर पर फैली है। उनके छोटे-छोटे Inspirational Clips ने उन लोगों तक भी अध्यात्म पहुँचाया है जो कभी मंदिर नहीं जाते थे। वे इस बात की सराहना करते हैं कि तकनीक के जरिए 'सत्संग' अब हर घर के मोबाइल तक पहुँच गया है। हालांकि, वे चेतावनी देते हैं कि Virtual World (आभासी दुनिया) कभी भी वास्तविक गुरु के सान्निध्य और प्रत्यक्ष साधना का स्थान नहीं ले सकती।

वे Addiction (लत) को आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। चाहे वह मोबाइल की लत हो या किसी नशीले पदार्थ की, यह सब मनुष्य की Consciousness (चेतना) को सुप्त कर देती हैं। महाराज जी का सुझाव है कि सुबह उठते ही सबसे पहले मोबाइल देखने के बजाय 'प्रभु का नाम' लेना चाहिए। इससे दिन की शुरुआत Positive Vibration (सकारात्मक तरंगों) के साथ होती है और मन स्थिर बना रहता है।

आध्यात्मिकता को वे एक 'Lifestyle' (जीवनशैली) के रूप में देखते हैं, जो हमें Self-Control (आत्म-संयम) सिखाती है। वे कहते हैं कि सोशल मीडिया पर दूसरों की नकल करने के बजाय हमें अपनी 'वास्तविक पहचान' को पहचानना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति तकनीक के साथ-साथ Daily Meditation और स्वाध्याय को जोड़ लेता है, तो वह इस आधुनिक युग में भी एक संत जैसा जीवन जी सकता है। उनका संदेश बहुत स्पष्ट है कि यंत्र का स्वामी बनो, उसके गुलाम नहीं।

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वर्तमान डिजिटल युग में Premanand Govind Sharan जी महाराज का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक और Insightful (सूझबूझ वाला) है। वे मानते हैं कि तकनीक और Social Media स्वयं में बुरे नहीं हैं, लेकिन उनका 'गलत उपयोग' मनुष्य की एकाग्रता और चरित्र को नष्ट कर रहा है। महाराज जी के अनुसार, युवा पीढ़ी आज रील और शॉर्ट वीडियो के जाल में फँसकर अपनी Creative Energy (रचनात्मक ऊर्जा) को बर्बाद कर रही है, जो वास्तव में चिंता का विषय है।

वे अक्सर अपने सत्संग में Digital Detox और 'स्वयं के साथ समय बिताने' पर जोर देते हैं। महाराज जी का कहना है कि जब तक हमारा मन बाहरी चकाचौंध में भटकता रहेगा, तब तक हम Inner Peace (आंतरिक शांति) की खोज नहीं कर पाएंगे। वे युवाओं को प्रेरित करते हैं कि वे इंटरनेट का उपयोग ज्ञान अर्जन और Positive Content (सकारात्मक सामग्री) के लिए करें, न कि केवल समय बिताने और वासनाओं को बढ़ाने के लिए।

महाराज जी की अपनी लोकप्रियता भी सोशल मीडिया के माध्यम से ही वैश्विक स्तर पर फैली है। उनके छोटे-छोटे Inspirational Clips ने उन लोगों तक भी अध्यात्म पहुँचाया है जो कभी मंदिर नहीं जाते थे। वे इस बात की सराहना करते हैं कि तकनीक के जरिए 'सत्संग' अब हर घर के मोबाइल तक पहुँच गया है। हालांकि, वे चेतावनी देते हैं कि Virtual World (आभासी दुनिया) कभी भी वास्तविक गुरु के सान्निध्य और प्रत्यक्ष साधना का स्थान नहीं ले सकती।

वे Addiction (लत) को आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। चाहे वह मोबाइल की लत हो या किसी नशीले पदार्थ की, यह सब मनुष्य की Consciousness (चेतना) को सुप्त कर देती हैं। महाराज जी का सुझाव है कि सुबह उठते ही सबसे पहले मोबाइल देखने के बजाय 'प्रभु का नाम' लेना चाहिए। इससे दिन की शुरुआत Positive Vibration (सकारात्मक तरंगों) के साथ होती है और मन स्थिर बना रहता है।

आध्यात्मिकता को वे एक 'Lifestyle' (जीवनशैली) के रूप में देखते हैं, जो हमें Self-Control (आत्म-संयम) सिखाती है। वे कहते हैं कि सोशल मीडिया पर दूसरों की नकल करने के बजाय हमें अपनी 'वास्तविक पहचान' को पहचानना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति तकनीक के साथ-साथ Daily Meditation और स्वाध्याय को जोड़ लेता है, तो वह इस आधुनिक युग में भी एक संत जैसा जीवन जी सकता है। उनका संदेश बहुत स्पष्ट है कि यंत्र का स्वामी बनो, उसके गुलाम नहीं।
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