एक महान अर्थशास्त्री (Economist) के रूप में डॉक्टर अंबेडकर के विचार आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) के लिए प्रासंगिक हैं। उनकी पीएचडी शोध 'द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी' (The Problem of the Rupee) ने भारतीय मुद्रा के प्रबंधन और विनिमय दर (Exchange Rate) पर गहरे सुझाव दिए थे। इसी शोध पत्र और हिल्टन यंग कमीशन को दिए गए उनके साक्ष्यों के आधार पर 'भारतीय रिजर्व बैंक' (Reserve Bank of India) की स्थापना की कल्पना की गई थी। वे भारत में मौद्रिक स्थिरता (Monetary Stability) के प्रबल समर्थक थे।
उन्होंने कृषि क्षेत्र में बड़े सुधारों (Agricultural Reforms) की वकालत की और खेती को एक उद्योग की तरह विकसित करने पर ज़ोर दिया। उनका मानना था कि छोटे खेतों के बजाय सामूहिक खेती (Collective Farming) के माध्यम से पैदावार बढ़ाई जा सकती है और किसानों को गरीबी से निकाला जा सकता है। उन्होंने भूमि सुधारों (Land Reforms) और जोतों के समेकन की बात कही ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके। कृषि को तकनीक और सिंचाई (Irrigation) से जोड़ना उनकी आर्थिक दृष्टि का मुख्य हिस्सा था।
औद्योगिकीकरण (Industrialization) को वे भारत की गरीबी और बेरोजगारी का एकमात्र समाधान मानते थे। उनका मानना था कि जब तक अधिशेष श्रम (Surplus Labour) खेती से निकलकर कारखानों में नहीं जाएगा, तब तक देश समृद्ध नहीं होगा। उन्होंने बिजली और पानी (Power and Water) के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 'दामोदर घाटी परियोजना' जैसी बड़ी नदी घाटी परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार की। वे जानते थे कि ऊर्जा की उपलब्धता ही उद्योगों के विकास की चालक (Driver of Development) बनेगी।
श्रमिकों के अधिकारों के लिए उन्होंने क्रांतिकारी बदलाव किए, जैसे काम के घंटों को 12 से घटाकर 8 घंटे (8-hour Workday) करना। उन्होंने कर्मचारी राज्य बीमा (ESI), महंगाई भत्ता और भविष्य निधि (Provident Fund) जैसी सुविधाओं की शुरुआत की ताकि मज़दूरों का जीवन सुरक्षित रहे। उनका आर्थिक मॉडल (Economic Model) पूंजीवाद और समाजवाद के बीच एक ऐसा संतुलन था जहाँ विकास के साथ सामाजिक सुरक्षा (Social Security) भी सुनिश्चित हो। वे श्रमिक वर्ग के सबसे बड़े मसीहा और योजनाकार थे।
राजस्व के बंटवारे और वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) पर उनके विचार आज के 'वित्त आयोग' (Finance Commission) की कार्यप्रणाली का आधार हैं। उन्होंने केंद्र और राज्यों के बीच करों के न्यायपूर्ण वितरण के लिए संवैधानिक प्रावधान किए। उनके आर्थिक दर्शन (Economic Philosophy) का केंद्र 'समावेशी विकास' था, जहाँ दलितों और पिछड़ों को भी संपत्ति और व्यापार में बराबर का अवसर मिले। आधुनिक भारत की आर्थिक संरचना पर डॉक्टर अंबेडकर की अमिट छाप है, जो हमें आत्मनिर्भरता की ओर ले जाती है।