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रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) के समापन के दौरान निभाई जाने वाली 'सुना वेश' (Suna Besha) रस्म भक्तों के लिए सबसे अधिक भव्य दृश्य होती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को सोने के भारी आभूषणों (Golden Ornaments) से सजाया जाता है। यह रस्म तब होती है जब भगवान अपनी यात्रा पूरी करके वापस मंदिर के बाहर पहुँचते हैं। माना जाता है कि भगवान के इस स्वर्ण रूप (Golden Form) के दर्शन करने से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि (Prosperity) आती है।

'सुना वेश' (Suna Besha) के लिए उपयोग किया जाने वाला सोना (Gold) कई किलो वजन का होता है। इसमें मुकुट, कुंडल, हार और सोने के हाथ-पैर (Gold Hands and Feet) शामिल होते हैं। इन आभूषणों को मंदिर के गुप्त खजाने (Secret Treasury) से बाहर निकाला जाता है और कड़ी सुरक्षा के बीच भगवान को पहनाया जाता है। रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) का यह दिन भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है क्योंकि भगवान राजाओं के राजा (King of Kings) के रूप में दिखाई देते हैं।

इस रस्म (Ritual) के पीछे ऐतिहासिक तथ्य यह है कि 15वीं शताब्दी में राजा कपिलेंद्र देव (King Kapilendra Deva) ने युद्ध में जीते हुए स्वर्ण भंडार को भगवान जगन्नाथ को समर्पित कर दिया था। तब से यह परंपरा (Tradition) निरंतर चली आ रही है। सोने की चमक और रथों की भव्यता मिलकर एक ऐसा नजारा पेश करती हैं जो आँखों को चकाचौंध कर देता है। रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) में 'सुना वेश' को देखने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु (Devotees) रात भर इंतजार करते हैं।

आभूषण पहनाने की प्रक्रिया (Process of Adorning) बहुत ही जटिल और समय लेने वाली होती है। मंदिर के प्रशिक्षित पुजारी (Trained Priests) ही इस कार्य को संपन्न करते हैं। आभूषणों की सुरक्षा के लिए पुलिस और मंदिर प्रशासन (Temple Administration) बहुत सख्त इंतजाम करते हैं। भगवान का यह रूप उनकी अपार शक्ति और ऐश्वर्य (Power and Grandeur) को प्रकट करता है। भक्त इसे 'राजराजेश्वर वेश' के नाम से भी जानते हैं।

सुना वेश (Suna Besha) के बाद भगवान को विशेष शीतल पेय 'अधर पणा' (Adhara Pana) अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही वे वापस अपने मुख्य मंदिर (Main Temple) में प्रवेश करते हैं। रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) का यह अंतिम चरण श्रद्धा और उत्सव की पराकाष्ठा है। यह रस्म हमें याद दिलाती है कि भगवान न केवल सादगी के प्रेमी हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के सर्वशक्तिमान स्वामी (Almighty Lord of Universe) भी हैं। यह भव्य समापन हर किसी के मन में गहरी छाप छोड़ जाता है।

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रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) के समापन के दौरान निभाई जाने वाली 'सुना वेश' (Suna Besha) रस्म भक्तों के लिए सबसे अधिक भव्य दृश्य होती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को सोने के भारी आभूषणों (Golden Ornaments) से सजाया जाता है। यह रस्म तब होती है जब भगवान अपनी यात्रा पूरी करके वापस मंदिर के बाहर पहुँचते हैं। माना जाता है कि भगवान के इस स्वर्ण रूप (Golden Form) के दर्शन करने से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि (Prosperity) आती है।

'सुना वेश' (Suna Besha) के लिए उपयोग किया जाने वाला सोना (Gold) कई किलो वजन का होता है। इसमें मुकुट, कुंडल, हार और सोने के हाथ-पैर (Gold Hands and Feet) शामिल होते हैं। इन आभूषणों को मंदिर के गुप्त खजाने (Secret Treasury) से बाहर निकाला जाता है और कड़ी सुरक्षा के बीच भगवान को पहनाया जाता है। रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) का यह दिन भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है क्योंकि भगवान राजाओं के राजा (King of Kings) के रूप में दिखाई देते हैं।

इस रस्म (Ritual) के पीछे ऐतिहासिक तथ्य यह है कि 15वीं शताब्दी में राजा कपिलेंद्र देव (King Kapilendra Deva) ने युद्ध में जीते हुए स्वर्ण भंडार को भगवान जगन्नाथ को समर्पित कर दिया था। तब से यह परंपरा (Tradition) निरंतर चली आ रही है। सोने की चमक और रथों की भव्यता मिलकर एक ऐसा नजारा पेश करती हैं जो आँखों को चकाचौंध कर देता है। रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) में 'सुना वेश' को देखने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु (Devotees) रात भर इंतजार करते हैं।

आभूषण पहनाने की प्रक्रिया (Process of Adorning) बहुत ही जटिल और समय लेने वाली होती है। मंदिर के प्रशिक्षित पुजारी (Trained Priests) ही इस कार्य को संपन्न करते हैं। आभूषणों की सुरक्षा के लिए पुलिस और मंदिर प्रशासन (Temple Administration) बहुत सख्त इंतजाम करते हैं। भगवान का यह रूप उनकी अपार शक्ति और ऐश्वर्य (Power and Grandeur) को प्रकट करता है। भक्त इसे 'राजराजेश्वर वेश' के नाम से भी जानते हैं।

सुना वेश (Suna Besha) के बाद भगवान को विशेष शीतल पेय 'अधर पणा' (Adhara Pana) अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही वे वापस अपने मुख्य मंदिर (Main Temple) में प्रवेश करते हैं। रथ यात्रा उत्सव (Rath Yatra Utsav) का यह अंतिम चरण श्रद्धा और उत्सव की पराकाष्ठा है। यह रस्म हमें याद दिलाती है कि भगवान न केवल सादगी के प्रेमी हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के सर्वशक्तिमान स्वामी (Almighty Lord of Universe) भी हैं। यह भव्य समापन हर किसी के मन में गहरी छाप छोड़ जाता है।
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