इस अद्भुत घटना को वैज्ञानिक भाषा में 'पैरालैक्स' (Parallax) या दृष्टि-लंबन कहा जाता है। यह हमारी आँखों के 'देखने के कोण' (Viewing Angle) और वस्तु की दूरी पर निर्भर करता है। जब हम किसी गतिमान वाहन (बस या ट्रेन) में होते हैं, तो पास की वस्तुएं, जैसे पेड़ या बिजली के खंभे, बहुत जल्दी हमारे दृष्टि क्षेत्र से बाहर निकल जाते हैं। उनका कोणीय विस्थापन (Angular Displacement) बहुत अधिक होता है।
जैसे-जैसे वस्तु की दूरी बढ़ती है, हमारे सापेक्ष उसकी स्थिति बदलने की गति कम महसूस होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई पेड़ खिड़की से 10 फीट दूर है, तो उसे पार करने में एक सेकंड का दसवां हिस्सा लगेगा। लेकिन यदि कोई पहाड़ (Mountain) 10 किलोमीटर दूर है, तो काफी देर तक यात्रा करने के बाद भी वह हमारी आँखों के सामने ही रहता है। उसका कोणीय वेग (Angular Velocity) बहुत कम होता है।
हमारा मस्तिष्क दूरी का आकलन इस आधार पर करता है कि कोई वस्तु कितनी तेजी से हमारे पीछे छूट रही है। दूर की वस्तुएं हमारे रेटिना (Retina) पर बहुत धीमी गति से अपनी जगह बदलती हैं। इसलिए हमें ऐसा भ्रम (Illusion) होता है कि वे पहाड़ स्थिर हैं या हमारे साथ-साथ चल रहे हैं। यह वही सिद्धांत है जिसके कारण रात में चंद्रमा (Moon) हमें अपना पीछा करता हुआ प्रतीत होता है।
वायुमंडल और परिप्रेक्ष्य (Perspective) भी इसमें भूमिका निभाते हैं। पास की वस्तुओं का विवरण (Details) हमें स्पष्ट दिखता है, जिससे उनकी गति का अहसास बढ़ जाता है। दूर के पहाड़ों का विवरण धुंधला होता है और वे हमारे देखने के क्षितिज (Horizon) का हिस्सा बन जाते हैं। जितनी बड़ी दूरी होगी, वस्तु उतनी ही अधिक समय तक हमारे सामने टिकेगी, जिससे वह स्थिर लगने लगती है।
यह भौतिकी का एक सरल ज्यामितीय (Geometrical) नियम है। खगोल विज्ञान (Astronomy) में तारों की दूरी मापने के लिए भी इसी पैरालैक्स विधि का उपयोग किया जाता है। यह हमें सिखाता है कि हमारी दृष्टि केवल गति को नहीं, बल्कि दूरी के अनुपात में गति के बदलाव को भी पहचानती है। सफर के दौरान यह अनुभव हमें ब्रह्मांड के विस्तार और गहराई (Depth Perception) का अहसास कराता है।