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राष्ट्रपति के अंगरक्षक (President's Bodyguard) भारतीय सेना की सबसे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित रेजिमेंट है, जो बीटिंग रिट्रीट समारोह की शोभा बढ़ाती है। ये घुड़सवार (Cavalry) अपनी शानदार वर्दी और अनुशासित घोड़ों के साथ राष्ट्रपति के काफिले (Convoy) का नेतृत्व करते हैं। विजय चौक पर उनका प्रवेश और प्रस्थान (Entry and Exit) अत्यंत गरिमामयी और प्रभावशाली होता है।

इस रेजिमेंट के जवानों का चयन अत्यंत कड़े शारीरिक और पेशेवर मानकों (Standards) के आधार पर किया जाता है। उनके घोड़ों का प्रशिक्षण (Training) भी बहुत विशेष होता है ताकि वे बैंड के शोर और भीड़ के बीच भी शांत और नियंत्रित बने रहें। घुड़सवार दस्ते की यह परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है, जिसे भारतीय सेना ने अपनी गौरवशाली विरासत (Glorious Heritage) के रूप में संजोया है।

समारोह के दौरान जब राष्ट्रपति वापस लौटते हैं, तो ये अंगरक्षक उन्हें सलामी (Salute) देते हैं और सुरक्षा घेरा बनाते हैं। उनकी उपस्थिति सर्वोच्च कमांडर (Supreme Commander) के प्रति सेना के सम्मान और निष्ठा (Loyalty) को दर्शाती है। इन जवानों के पास आधुनिक हथियारों के साथ-साथ पारंपरिक भाले और तलवारें (Lances and Swords) भी होती हैं।

अंगरक्षकों की वर्दी (Uniform) में लाल रंग का कोट, सफेद पतलून और ऊंची टोपी शामिल होती है, जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान (Unique Identity) देती है। वे न केवल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे भारतीय गणतंत्र की शान और मर्यादा के रक्षक भी हैं। उनके घोड़ों की सजावट और उनकी चाल की सटीकता (Precision) दर्शकों का मन मोह लेती है।

विजय चौक की ढलान पर जब ये घुड़सवार अपनी पूरी गति और अनुशासन (Discipline) के साथ मार्च करते हैं, तो वह दृश्य अदम्य साहस का परिचय देता है। राष्ट्रपति के अंगरक्षक होना किसी भी सैनिक के लिए सर्वोच्च सम्मान की बात होती है। यह दस्ता भारत की समृद्ध सैन्य संस्कृति (Military Culture) का एक जीवंत प्रतीक है जो हर साल बीटिंग रिट्रीट में आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है।

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राष्ट्रपति के अंगरक्षक (President's Bodyguard) भारतीय सेना की सबसे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित रेजिमेंट है, जो बीटिंग रिट्रीट समारोह की शोभा बढ़ाती है। ये घुड़सवार (Cavalry) अपनी शानदार वर्दी और अनुशासित घोड़ों के साथ राष्ट्रपति के काफिले (Convoy) का नेतृत्व करते हैं। विजय चौक पर उनका प्रवेश और प्रस्थान (Entry and Exit) अत्यंत गरिमामयी और प्रभावशाली होता है।

इस रेजिमेंट के जवानों का चयन अत्यंत कड़े शारीरिक और पेशेवर मानकों (Standards) के आधार पर किया जाता है। उनके घोड़ों का प्रशिक्षण (Training) भी बहुत विशेष होता है ताकि वे बैंड के शोर और भीड़ के बीच भी शांत और नियंत्रित बने रहें। घुड़सवार दस्ते की यह परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है, जिसे भारतीय सेना ने अपनी गौरवशाली विरासत (Glorious Heritage) के रूप में संजोया है।

समारोह के दौरान जब राष्ट्रपति वापस लौटते हैं, तो ये अंगरक्षक उन्हें सलामी (Salute) देते हैं और सुरक्षा घेरा बनाते हैं। उनकी उपस्थिति सर्वोच्च कमांडर (Supreme Commander) के प्रति सेना के सम्मान और निष्ठा (Loyalty) को दर्शाती है। इन जवानों के पास आधुनिक हथियारों के साथ-साथ पारंपरिक भाले और तलवारें (Lances and Swords) भी होती हैं।

अंगरक्षकों की वर्दी (Uniform) में लाल रंग का कोट, सफेद पतलून और ऊंची टोपी शामिल होती है, जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान (Unique Identity) देती है। वे न केवल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे भारतीय गणतंत्र की शान और मर्यादा के रक्षक भी हैं। उनके घोड़ों की सजावट और उनकी चाल की सटीकता (Precision) दर्शकों का मन मोह लेती है।

विजय चौक की ढलान पर जब ये घुड़सवार अपनी पूरी गति और अनुशासन (Discipline) के साथ मार्च करते हैं, तो वह दृश्य अदम्य साहस का परिचय देता है। राष्ट्रपति के अंगरक्षक होना किसी भी सैनिक के लिए सर्वोच्च सम्मान की बात होती है। यह दस्ता भारत की समृद्ध सैन्य संस्कृति (Military Culture) का एक जीवंत प्रतीक है जो हर साल बीटिंग रिट्रीट में आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है।
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